शनिवार, 16 जनवरी 2021

५२५. जाड़ों की धूप


जाड़ों की गुनगुनी धूप 

कितनी ममता-भरी है,

जब खड़ा होता हूँ,

तो हाथ रख देती है सिर पर,

सहलाती है गालों को,

जब लेटता हूँ,

तो थपकाती है पीठ,

सुला देती है मुझे.

मैं सपने देखने लगता हूँ,

कहीं और पहुँच जाता हूँ,

भूल जाता हूँ उस धूप को,

जिसने थपकी देकर मुझे सुलाया था.

14 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन  में" आज रविवार 17 जनवरी 2021 को साझा की गई है.........  "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. मंत्रमुग्ध करती भावाभिव्यक्ति ।

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  3. बहुत सुंदर। बहुत ही बढ़िया। शुभकामनाएँ। सादर।

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  4. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार 18 जनवरी 2021 को 'यह सरसराती चलती हाड़ कँपाती शीत-लहर' (चर्चा अंक-3950) पर भी होगी।--
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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  5. जाड़े की धूप का बहुत सुंदर चित्रण ...

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  6. बहुत ही खूबसूरत एवं मनमोहक छायाचित्र जाड़े की गुनगुनी धूप का..सुन्दर कृति..

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  7. वाह कितने जीवंत अहसास है ,
    शानदार सृजन।

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  8. कच्ची , गुनगुनी धूप, सुखद अहसास दिलाएँ बहुत ही बढ़िया

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