सोमवार, 13 सितंबर 2021

६००.दूरी



काश कि मेरी ख़ुशी में 

तुम भी शामिल होते. 


एक वक़्त वह भी था,

जब हर ख़ुशी में 

हम साथ होते थे,

मैं तुम्हारे पास 

या तुम मेरे पास,

पर अब साथ होना 

सपना-सा हो गया है,

अब तुम अशक्त 

और मैं व्यस्त. 

अब तुम्हारे बिना ही मुझे 

मनानी होंगी सारी ख़ुशियाँ. 


अक्सर ऐसा क्यों होता है 

कि जब किसी की ज़रूरत 

सबसे ज़्यादा महसूस होती है,

वह अचानक दूर हो जाता है? 


10 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर सृजन| हिंदी दिवस की शुभकामनाएं |

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  2. जब तक पास रहता है तो अहमियत नहीं लगती ।।

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  3. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (15-09-2021) को चर्चा मंच       "राजभाषा के 72 साल : आज भी वही सवाल ?"   (चर्चा अंक-4188)  पर भी होगी!--सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार करचर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।--
    हिन्दी दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   

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  4. सुप्रभात
    उम्दा रचना ओंकार जी |

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  5. बहुत सुन्दर !
    बिछड़ने के सौ बहाने हैं !

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  6. अक्सर ऐसा क्यों होता है
    कि जब किसी की ज़रूरत
    सबसे ज़्यादा महसूस होती है,
    वह अचानक दूर हो जाता है?

    इस प्रश्न का जवाब मैं भी ढूंढ रही हूं!पर मुझे अब तक न पाया!पता नहीं क्यों लोग जरूरत के वक्त ही दूर जाते हैं! जो कभी मुस्कान हुआ करते थे!
    वे आंसुओं की वजह क्यों बन जाते हैं?
    जिन रिश्तो में पाने और खोने
    जैसा कुछ भी नहीं होता?
    वे रिश्ते भी सिर्फ नाम के क्यों रह जाते हैं?
    बहुत ही मार्मिक और हृदय स्पर्शी रचना!

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  7. अन्तर्मन को छूती रचना ।बहुत बधाई ओंकार जी ।

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  8. मर्म को छूती गहन शब्द रचना।
    सुंदर।

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