बुधवार, 17 मार्च 2021

५४५. दाँत

 Teeth, Mouth, Dental, Dentist, Tooth

यह न समझना
कि तुम्हारी जीभ
तुम्हारे मुँह में है,
तो सुरक्षित है. 


बड़ी कोमल है,
बड़ी नादान है,
बड़ी मासूम है
तुम्हारी जीभ. 


ताक में बैठे हैं
तुम्हारे बत्तीस दाँत,
मौक़ा मिलते ही
टूट पड़ेंगे उसपर.

 
बाहरवाले नहीं,
तुम्हारी जीभ को
काट खाएंगे
तुम्हारे अपने ही दाँत।

15 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 19-03-2021) को
    "माँ कहती है" (चर्चा अंक- 4010)
    पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.


    "मीना भारद्वाज"

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  2. बिलकुल .... घर का भेदी ही तो लंका ढाता है . विचारशील रचना .

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. अक्सर घर वालों से भी सचेत ही रहना पड़ता है,सुंदर सृजन,सादर नमन

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  5. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 18 मार्च 2021 शाम 5.00 बजे साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. वाह क्या बात है बिल्कुल सत्य फरमाया आपने

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  7. सुंदर सार्थक अभिव्यक्ति ।

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  8. लाजवाब 👌
    बाहरवाले नहीं,
    तुम्हारी जीभ को
    काट खाएंगे
    तुम्हारे अपने ही दाँत।..वाह!

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  9. गहन भाव,आस्तीन में साँप बैठे तो कैसे बचेगें ।
    घर में ही शत्रु तो फिर सुरक्षा कैसी।
    सुंदर प्रस्तुति।

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  10. बचपन की रचना याद आ गई,
    मैं बत्तीस तू अकेला
    मेरे बीच जो आयेगा,
    सर तेरा कट जायेगा,
    यानी अपनों से ही सावधान रहें, बेहतरीन रचना, बधाई हो आपको

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  11. भीतर घात सबसे भयावह है🙏🙏

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