वह वही करती थी,
जो वह कहता था,
वैसे ही रहती थी,
जैसे वह रखता था,
वही बोलती थी,
जो वह चाहता था.
मैंने कभी नहीं देखा उन्हें उलझते,
कभी नहीं खड़के उनके घर बर्तन,
रातों को शांत रहता था उनका घर,
कोई सिसकी नहीं आती थी वहाँ से.
सालों बाद मैंने जाना
कि दुःखी होने के लिए
ज़रूरी नहीं होता रोना
और नहीं सिसकने का मतलब
नहीं होता ख़ुश होना.

