बरामदे के कोने में
वह चुपचाप पड़ी रहती है,
कोई नसीहत नहीं देती,
कोई टाँग नहीं अड़ाती.
जो दे दो,पहन लेती है,
जो खिला दो,खा लेती है,
जहाँ ले जाओ,चली जाती है,
जहाँ छोड़ दो, रह जाती है.
न कुछ मांगती है,
न ज़िद करती है,
कभी कोई डाँट दे,
तो बस सुन लेती है.
कोई शिकायत नहीं करती,
आँसू तक नहीं बहाती,
फिर भी वह मुझे नहीं सुहाती,
क्योंकि वह खाँसती बहुत है.
