मंगलवार, 2 अगस्त 2022

६५९.इमारत

 



वह इमारत आज फिर उदास है,

आज फिर कोई कूदा है उसकी छत से. 


उस इमारत में कोई नहीं रहता,

वह बस कूदने के काम आती है, 

इमारत का दिल बहुत धड़कता है,

जब कोई उसकी सीढ़ियाँ चढ़ता है. 


इमारत चाहती है ज़मींदोज़ होना,

आसमान छूना पसंद नहीं उसे,

वह चाहती है, जहाँ वह खड़ी है,

कोई छोटी-सी झोपड़ी बने वहाँ ,

जिस पर से कोई कूद न सके,

कूद भी जाय, तो मर न सके. 


11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी चिन्तन शैली अनूठी है । मर्मस्पर्शी सृजन ।

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  2. इमारत की चाहना सच्चे अर्थों में संवेदनशील है ।

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 4 अगस्त 2022 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  4. मर्मस्पर्शी रचना । बधाई ।

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  5. बेहतरीन, दिल को भीतर तक हिला देने वाली रचना
    कौन चाहेगा वह जिंदगी नहीँ मौत के काम आए!
    संवेदना की अनुपम मिसाल

    सादर

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  6. कितनी सुंदर, मार्मिक रचना है!

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  7. कितने गूढ़ भावों को लिखा है आपने ।

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  8. अत्यंत भाव प्रवण और मर्म स्पर्शी।

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