गुरुवार, 28 जुलाई 2022

६५८.आख़िरी मौक़ा



उसने अपने जीवन में 

कभी कुछ नहीं बोला,

जहाँ बोलना चाहिए था,

वहाँ भी वह चुप रहा. 


कई बार उसे लगा 

कि वह बोलने से ख़ुद को 

रोक नहीं पाएगा,

पर उसने अपनी हथेली 

अपने मुँह पर रख ली. 


उसे अपने न बोलने पर 

बहुत गुस्सा आता था,

पर उसने कुछ नहीं कहा,

उसे जितना गुस्सा आता था,

उससे ज़्यादा डर लगता था. 


मौत से ठीक पहले भी 

वह बोलने का साहस 

जुटा नहीं पाया,

जबकि उसे पता था 

कि उसके लिए बोलने का 

यह आख़िरी मौक़ा था.


17 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (30-07-2022) को   "काव्य का आधारभूत नियम छन्द"    (चर्चा अंक--4506)  पर भी होगी।
    --
    कृपया अपनी पोस्ट का अवलोकन करें और सकारात्मक टिप्पणी भी दें।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ओह! चुप्पी से उबरने का एक मौक़ा... कितना कुछ रहा होगा उस चुप्पी में.

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  3. हमेशा की तरह चिन्तन को प्रेरित करती सुन्दर कृति ॥

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  4. वाह वाह! अर्थदर्शी चिंतन।

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  5. ओह! चुप्पी की वेदना! बहुत खूब। सादर।

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  6. कहने के बाद के आसन्न खौफ से चुप रहने की विवशता को दर्शाती उत्कृष्ट रचना! हार्दिक साधुवाद!--ब्रजेन्द्र नाथ

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  7. डर इंसान को कितना चूप रहने विवश करता है यह बतलाती सुंदर रचना।

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  8. मन की भीरुता ऐसा करवाती है देखा गया है उन लोगों में जिनको बचपन में अभिभावकों
    द्वारा कड़े अनुशासन में डरा कर रखा जाता है।
    बहुत गहन हृदय स्पर्शी सृजन।

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  9. जो लोग आसानी से अपने मन की बातें कह देते हैं, वह नहीं समझ पाते चुप्पी के कारागार में बन्द रह कर न बोल काने का दुख

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  10. शानदार कविता के लिए बधाई ।
    डॉ मनोज रस्तोगी, मुरादाबाद

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  11. यह कविता नहीं मनोविज्ञान का दस्तावेज है।

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