मैंने पिता को कभी रोते नहीं देखा,
किसी अपने की मौत पर भी नहीं,
ग़म का पहाड़ टूटने पर भी नहीं,
बस उनकी आवाज़ भर्रा जाती थी,
या दिख जाती थी थोड़ी-सी नमी
उनकी पलकों के ठीक पीछे.
रात को मेरी नींद उचटती थी,
तो एक सिसकी सुनाई पड़ती थी,
दबी-कुचली, ज़िद्दी-सी सिसकी,
पिता थोड़े चिड़चिड़े हो गए थे,
बूढ़े होने की जल्दी में लगते थे.
काश कि वे खुलकर रो लेते,
काश कि मैं उनसे कह पाता
कि पिता भी कभी-कभी रो सकते हैं.




