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शनिवार, 12 जून 2021

५७८. पिता

 


मैंने पिता को कभी रोते नहीं देखा,

किसी अपने की मौत पर भी नहीं,

ग़म का पहाड़ टूटने पर भी नहीं, 

बस उनकी आवाज़ भर्रा जाती थी,

या दिख जाती थी थोड़ी-सी नमी

उनकी पलकों के ठीक पीछे. 


रात को मेरी नींद उचटती थी,

तो एक सिसकी सुनाई पड़ती थी,

दबी-कुचली, ज़िद्दी-सी सिसकी,

पिता थोड़े चिड़चिड़े हो गए थे,

बूढ़े होने की जल्दी में लगते थे. 


काश कि वे खुलकर रो लेते,

काश कि मैं उनसे कह पाता 

कि पिता भी कभी-कभी रो सकते हैं. 


गुरुवार, 10 जून 2021

५७७.अंत



गुलमोहर के पेड़ पर खिले 

आख़िरी फूल,

तुम्हारी जिजीविषा को सलाम।


गिरते रहे एक-एक कर 

तुम्हारे साथ खिले फूल,

पर तुम डटे रहे,

लड़ते रहे तूफ़ानों से,

भिड़ते रहे बारिशों से,

पर अब तुम्हें जाना होगा,

मिलना होगा मिट्टी में. 


जिन पत्तों से तुम घिरे हो,

जिस डाल पर खिले हो,

जिस पेड़ से जुड़े हो,

सब होंगे एक दिन धराशाई,

कोई पहले,कोई बाद में. 


यहाँ तक कि तुम्हारे पेड़ की जड़ें,

जो घुस गई हैं ज़मीन में गहरे तक,

एक दिन सूख जाएंगी,

अंत निश्चित है उनका भी.


बुधवार, 9 जून 2021

५७६.रात

 


कोई-कोई रात 

बहुत अंधेरी होती है,

पूनम का चाँद खिला हो,

तो भी ऐसा हो सकता है. 


सब दिखता है आँखों से,

पर नींद जैसे रूठकर 

कोसों दूर चली जाती है,

दिमाग़ जैसे सुन्न हो जाता है. 


ऐसे में ख़ुद को थामे रखिए,

हाथों में हाथ डाले रहिए,

इंतज़ार कीजिए,

यह वक़्त भी गुज़र जाएगा. 


कोई रात कितनी ही डरावनी क्यों न हो,

सुबह को आने से नहीं रोक सकती.


शनिवार, 5 जून 2021

५७५. दुश्मन





अँधेरी रात,

बियाबान जंगल,

बेबस,अकेला मैं. 


बढ़ी चली आ रही हैं 

मेरी ओर धीरे-धीरे 

दो चमकती आँखें,

मौत के डर से 

पसीना-पसीना 

हुआ जा रहा हूँ मैं. 


अरे,वहशी जानवर नहीं,

यह तो कोई मददगार है,

जो पास आ पहुँचा है मेरे

हाथों में दिए लिए. 


अब कोई डर नहीं,

पार कर लूँगा मैं

यह घनघोर जंगल,

चला जाऊंगा 

अँधेरे से बहुत दूर. 


कल्पनाओं का जंगल,

आशंकाओं का अँधेरा,

वहम का जानवर -

यह सारा ताना-बाना

जिसने बुना है,

वह मेरा होकर भी 

मेरा दुश्मन है.  


बुधवार, 2 जून 2021

५७४. सौ साल पहले की विधवा

 


मैं सौ साल पहले की 

वही विधवा बहू हूँ,

जो कोठरी में बंद रहती थी,

खाने के नाम पर जिसे 

सूखी रोटियाँ मिलती थीं

और दिन-भर के काम के बदले 

दुनिया-भर की झिड़कियाँ।


मैं सौ साल पहले की 

वही विधवा बहू हूँ,

जो सिर्फ़ इसलिए पिट जाती थी 

कि उसने किसी को देखकर 

थोड़ा-सा मुस्करा दिया था

या तेज़ हवा में सरक गया था 

उसका आँचल ज़रा-सा. 


मैंने फिर से जन्म लिया है 

ताकि बदला ले सकूँ उनसे,

पर जब खोजने निकलती हूँ,

तो कुछ पता ही नहीं चलता, 

हर क़दम पर मुझे 

ऐसे लोग मिलते हैं,

जिन्हें देखकर लगता है 

कि यही हैं वे,

जिन्होंने सैकड़ों साल पहले 

मुझे गर्म सलाख़ों से दागा था.