जाड़ों की गुनगुनी धूप
कितनी ममता-भरी है,
जब खड़ा होता हूँ,
तो हाथ रख देती है सिर पर,
सहलाती है गालों को,
जब लेटता हूँ,
तो थपकाती है पीठ,
सुला देती है मुझे.
मैं सपने देखने लगता हूँ,
कहीं और पहुँच जाता हूँ,
भूल जाता हूँ उस धूप को,
जिसने थपकी देकर मुझे सुलाया था.





