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गुरुवार, 12 नवंबर 2020

५०२.मौत के बाद


वह कौन है,

जिसकी आवाज़ 

हर ओर सुनाई देती है,

जिसकी हँसी

हमेशा कानों में गूंजती है?

कई दिन बीत गए,

जिसे विदा किए,

पर जिसकी सूरत 

हर तरफ़ दिखाई पड़ती है.


यह कैसा भ्रम है

कि वह दिखता भी है 

और नहीं भी,

वह वाचाल भी है 

और चुप भी,

वह है भी 

और नहीं भी.


असल में वह नहीं है,

पर अपने न होने में 

वह पहले से कहीं ज़्यादा है,

जैसे कि वह पूरा ज़िन्दा हुआ हो 

अपनी मौत के बाद.


सोमवार, 9 नवंबर 2020

५०१. कलाकार से

सुनो कलाकार,

गली-गली घूमकर 

चिल्लाने से क्या फ़ायदा,

यहाँ सभी बहरे हैं,

कोई नहीं ख़रीदेगा

तुम्हारा सामान,

कोई नहीं पहचानेगा 

तुम्हारा हुनर.


अगर चाहते हो 

कि तुम्हारा सामान बिके,

तुम्हारे हुनर की क़द्र हो,

तो गली-गली घूमना छोड़ो,

चुपचाप घर बैठो.


यह बात गांठ बाँध लो

कि पुकारकर बेचने से 

अनमोल चीज़ की भी 

कोई क़ीमत नहीं होती.

शनिवार, 7 नवंबर 2020

५००. सीखने का समय



बहुत हो गया अब,

छोड़ो कॉपी-किताब,

फेंक दो चाक-पेंसिल,

बंद करो भागना अब 

घंटी की आवाज़ पर.


आओ, ज़रा खुले में चलें,

तितलियों के पीछे दौड़ें,

बंद आँखों पर महसूस करें,

बारिश की गिरती बूँदें.


देखो, सूर्यास्त के समय 

कैसे रंग बदलता है आकाश,

कैसे मौसम बदलते ही

रूप बदलता है पेड़.


चलो, नदी के किनारे चलें,

संगीत सुनें बहते पानी का,

कंकड़ फेंक कर देखें,

कैसे उछलता है पानी.


चलो, ज़ोर से दौड़ें

ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर,

छाले पड़ जायँ पाँवों में,

छिल जायँ घुटने.


उतार फेंकें बोझ,

आज खुलकर हँस लें,

बर्बाद कर दिया हमने 

बहुत सारा वक़्त,

अब सीखने का समय है. 

गुरुवार, 5 नवंबर 2020

४९९. चाँदनी



क्या आपने चाँद की ओर ताकते हुए 

कभी चाँदनी में नहाकर देखा है?

लगता है किसी छोटे से फव्वारे से 

ढेर सारी रौशनी बरस रही हो.


अचानक चाँद बादलों में छिप जाता है,

अतृप्ति का भाव मन में जगाता है,

पर थोड़ी देर में बादल छंट जाते हैं,

दूधिया चाँदनी फिर से बरसने लगती है .


कभी घर से निकलकर देखो

या खुली छत पर जाकर देखो,

अभी तो चाँद आकाश में है,

नहा लो जी भर के चाँदनी में,

फिर न जाने कितना इंतज़ार करना पड़े.


रातें अमावस की भी होती हैं

और कभी-कभी ऐसा भी होता है 

कि रात तो पूनम की होती है,

पर ज़िद्दी बादल चाँद को उगने नहीं देते.

सोमवार, 2 नवंबर 2020

४९८. पटरियाँ

 Rails, Soft, Gleise, Railway

रेलगाड़ी की पटरियाँ

चलती चली जाती हैं,

किसी पटरी से मिलती हैं,

तो किसी से बिछड़ती हैं,

कभी जंगलों से गुज़रती हैं,

तो कभी रेगिस्तानों से,

कभी चट्टानों से,

तो कभी मैदानों से.

कभी सख्त ज़मीन पर चलती हैं,

तो कभी मुलायम मिट्टी पर,

आख़िर एक जगह पहुँचकर

रुक जाती हैं रेल की पटरियाँ,

जीवन भी ऐसा ही है,

रेल की पटरियों जैसा.