एक पंछी उड़ते हुए आया,
मेरी खिड़की पर बैठा,
पूछा,'पिंजरे में कैसा लगता है?'
मैंने कोई जवाब नहीं दिया,
उसने हँसते हुए पूछा,
'दाना-पानी है न?'
और फुर्र से उड़ गया.
***
उड़े जा रहे हैं
कुछ पंछी आकाश में
आपस में बतियाते
कि बहुत शांति है आज,
सब बंद हैं घरों में,
ये जब बाहर होते हैं,
तो कितना शोर मचाते हैं!
***
एक पंछी नाच रहा है सड़क पर,
कह रहा है लोगों से,
अब पिंजरे में रहने के
तुम्हारे दिन आए,
हम आज़ाद हैं,
तुम्हारी बनाई सड़कों पर
तुम्हारी अनुमति के बिना
थोड़ा हम भी फुदकेंगे.
थोड़े दिन के लिए
चलो,पंछी बनकर देखें,
मुँह अँधेरे उठ जायँ,
चहकें साथ मिलकर,
डाली-डाली, पेड़-पेड़ फुदकें,
जहाँ मर्ज़ी बैठें,
उड़ान भरें मुक्त आकाश में,
सूरज को क़रीब से देखें.
अपने ही घर में झांकें
बंद खिडकियों के पार से,
घोंसला बना लें
कहीं किसी पेड़ पर,
मुंडेर पर रखे कटोरे से
चोंच-भर पानी पी लें,
आँगन में फेंका गया दाना
थोड़ा-सा चुग लें.
बहुत देख लिया इंसान बनकर,
लॉकडाउन खुलने तक
चलो पंछी बनकर देखें.
वह जो खटिया तुमने
आँगन के कोने में रखी है,
धूप में तपती है,
बारिश में भीगती है.
निवारें फट रही हैं उसकी,
पाए टूट रहे हैं,
हवा से चरमराती है,
दर्द से कराहती है वह खटिया.
थोड़ी सुध ले लो उसकी,
थोड़ी मरम्मत करा दो उसकी,
चाहो तो आँगन में ही रखो,
पर धूप-बारिश से बचा लो उसको.
कैसे समझओगो आज ख़ुद को,
कैसे अनदेखी करोगे उसकी,
आज तो तुम यह भी नहीं कह सकते
कि तुम्हारे पास समय नहीं है.
सालों बाद ख़ुश हैं
अलमारी में रखी किताबें,
शायद कोई निकालेगा उनको,
शायद धूल झड़ेगी उनकी.
बुकमार्क काम आएगा शायद,
पलटे जाएंगे किताबों के पन्ने,
पढ़े जाएंगे उनमें लिखे शब्द,
सराहा जाएगा शायद उनको.
झूलेंगी आरामकुर्सी पर किताबें,
कमरे से बालकनी में आएंगी,
खुली हवा में सांस लेंगी,
महसूस करेंगी चाय की महक.
अलमारी में रखी किताबें इंतज़ार में हैं,
रह-रह कर देख रही हैं उम्मीद से,
शायद अब फिरेंगे दिन उनके,
शायद टूटेगा उनका लॉकडाउन.
कच्ची कैरी-सी,
इमली-सी,
गोलगप्पे के चटपटे पानी-सी,
दोने में रखी झालमुड़ी-सी,
झाड़ियों में लगे
खट्टे-मीठे बेर-सी,
पेड़ पर पड़े झूले-सी,
पत्तों में फुदकती चिड़िया-सी,
फूलों में उडती तितली-सी,
बारिश की फुहार-सी,
जाड़ों की धूप-सी,
बस ऐसी ही होती हैं बेटियां.