एक डर है,
जो अन्दर गहरे
घुसा जा रहा है.
नींद की तलाश में
रातें बिस्तर पर
करवटें बदलती हैं.
बड़ी देर में होती हैं
आजकल सुबहें,
सूरज थका-सा लगता है.
दोपहर उदास है,
शाम चिड़चिड़ी-सी,
वक़्त जैसे ठहरा पानी.
चाँद निकल आया है
आसमान में, लेकिन
उसमें धब्बे बहुत हैं.
मुझे आश्चर्य होता है
कि कैसे बदल देता है दुनिया
एक बिनबुलाया डर.




