सांता,
तुम क्रिसमस पर हर साल आते हो,
तरह-तरह के उपहार लाते हो-
टॉफ़ी,बिस्कुट और न जाने क्या-क्या.
इस बार आओ, तो उपहारों के साथ
चुनिन्दा संस्कार भी ले आना,
टॉफ़ी,बिस्कुट तो ख़त्म हो जाएंगे,
पर संस्कार शायद जड़ें जमा लें
और आज के बच्चे कल बड़े होकर
शायद आज के बड़ों से कुछ अलग हों.
मज़बूत औरतों,
ज़रा संभल के रहना,
कमज़ोर औरतों से
अब वे ऊब चुके हैं.
उनके पुरुषत्व ने उन्हें
नई चुनौती दी है,
अब उन्हें काबू करना है
उन औरतों को,
जो कमज़ोर औरतों के लिए
आवाज़ उठाती हैं.
उन्हें साबित करना है
कि वे मज़बूत औरतों को
कमज़ोर बना सकते हैं.
मज़बूत औरतों,
तुम्हें बस इतना करना है
कि मज़बूत बने रहना है
और कमज़ोर औरतों को
अपने जैसा बनाना है.
बालकनी में बैठकर धूप सेकना,
गुड़ में पगे तिल के लड्डू खाना,
मूँगफलियाँ छीलकर दाने चबाना,
मूली के गर्मागर्म पराठे सटकाना.
अदरकवाली चाय की ख़ुश्बू ,
घी में सिकते हलवे की महक,
टमाटर का सूप,संतरे का रस,
मक्के की रोटी,सरसों का साग.
सूरज को छकाती अलसाई-सी सुबह,
पत्तों पर ठहरीं ओस की बूँदें,
शॉल में लिपटी सुरमई-सी शाम,
रजाई में दुबकी ठंडी-सी रात.
इस मौसम में आपके पास इतना कुछ है,
तो आपसे धनी और कौन है?
मन पर लगाम कस के,
कई दिनों की कोशिशों से
उस लड़की ने जुटाए हैं
एक कप कॉफ़ी के पैसे.
टॉफ़ी खाई है कई बार उसने,
कोक भी पीया है एक बार,
बस कॉफ़ी ही नहीं चखी है-
सुन्दर से कप में परोसी,
गर्मागर्म झागवाली कॉफ़ी.
बहुत ख़ुश है आज वह लड़की,
आख़िर वह भी चखेगी कॉफ़ी,
देर तक महसूस करेगी उसका स्वाद,
घूँट-घूँट उतारेगी गले से नीचे,
आज महसूस करेगी वह
कि अमृत का स्वाद कैसा होता है.
छोटी-सी गिलहरी
दौड़ती-भागती रहती है
ऊंचे पेड़ की शाखों पर,
पेड़ को गुदगुदी होती है,
पर कुछ नहीं कहता वह,
उसके पत्ते हिलते हैं,
वह बस हँसता रहता है.