रविवार, 25 जुलाई 2021

५९१.माली से




माली,

तुमने अच्छा किया 

कि सुन्दर बगिया बनाई,

ऐसे फूल खिलाए,

जिनकी महक खींच लाए 

दूर से किसी को भी,

पर अब एक-से फूलों 

और एक-सी ख़ुश्बू से 

मेरा मन ऊब रहा है. 


माली,

अब दूसरे पौधे लगाओ,

दूसरे फूल खिलाओ,

जिनमें ख़ुश्बू भले कम हो, 

पर जो थोड़े अलग हों.  

15 टिप्‍पणियां:

  1. छोटी सी बात -- सरल अभिव्यक्ति बड़ा दर्शन | शुभकामनाएं ओंकार जी |

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार(२८-०७-२०२१) को
    'उद्विग्नता'(चर्चा अंक- ४१३९)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  3. बिल्कुल सही ! एकरसता ऊब पैदा कर ही देती है !

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  4. फूल तक तो ठीक है लेकिन हर जगह परिवर्तन नहीं हो सकता ।
    भावपूर्ण अभिव्यक्ति ।

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  5. सुन्दर सारगर्भित,गूढ़ रचना।

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  6. कुछ अलग की जरूरत तो हर किसी को होती है ... जाने पहचाने को भी उबाऊ बना देती है ...

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