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गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

823. दिवाली के बाद



1.

दिवाली के बाद सड़कों पर

यूं बिखरा था पटाखों का मलबा,

जैसे काम निकल जाने के बाद

सही चेहरा दिखे किसी का।

2.

पटाखों का मलबा देखा,

तो मैंने सोचा,

कितना शोर कर रहे थे कल,

आज जाकर पता चली

इनकी असली औक़ात।

3.

सड़क पर पड़े रॉकेट ने कहा,

कुछ सीखो मुझसे,

जो बहुत ऊपर जाता है,

उसे भी आना पड़ता है ज़मीन पर

कभी-न-कभी।

4.

रॉकेट जो कल उड़कर

आसमान में पहुंचा था,

आज इतना बेबस है

कि नहीं बदल सकता

अपने आप करवट भी।

5.

ये चल चुके पटाखे हैं,

फेंक दो इन्हें कूड़ेदान में,

तब की बात और थी,

जब इनमें बारूद भरा था।


शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

822. दिवाली पर कुछ हास्य कविताएं

मैं आम तौर से हास्य कविताएं नहीं लिखता, पर इस दिवाली में ऐसी कुछ छोटी-छोटी कविताएं लिखी गईं। मैं इस अनुरोध के साथ साझा कर रहा हूँ कि इन्हें मेरा व्यक्तिगत अनुभव न माना जाय। पाठक ऐसी कोई भी टिप्पणी करने से बचें, जिससे मेरी दिवाली ख़राब होने की संभावना हो।

1.

तुमने रंगोली बनाई,

तो मुझे कहना ही पड़ा

कि अच्छी है,

पिछली बार सच बोला था,

तो सुननी पड़ी थी

पटाखों की आवाज़।

2.

यह दिवाली का बम नहीं

कि बस एक बार फटे,

चिंगारी लग गई,

तो कौन जाने,

कितनी बार फटे।

3.

तुम चकरी चलाती हो,

तो मैं सोचता हूँ,

कितना हुनर है तुममें,

तुम्हें बनाना भी आता है,

चलाना भी।

4.

हमेशा मत फटा करो

लाल पटाखों की तरह,

कभी-कभी ही सही,

दूर चली जाया करो

रॉकेट की तरह।

5.

यह ऐसा पटाखा है,

जो कभी फुस्स नहीं होता,

एक बार आ जाए,

तो फटकर ही मानता है।




सोमवार, 13 अक्टूबर 2025

821. कीचड़ और कमल

 

 


मैं जिससे निकला हूँ, 

असहज हूँ उससे, 

कहाँ मैं कमल,

कहाँ वह कीचड़, 

मैं ख़ुशबू से सराबोर, 

वह बदबूदार। 

कोई मेल नहीं 

मेरा और उसका, 

उसके साथ रहना 

उतना बुरा नहीं लगता, 

जितना उसके साथ दिखना। 

काश कि मैं जा पाता 

उससे बहुत दूर,

जैसे बच्चे चले जाते हैं 

गाँव से शहर 

कभी न लौटने के लिए। 


सोमवार, 29 सितंबर 2025

820. ज़ुबिन की याद में

 


पिछले दिनों असम के मशहूर गायक ज़ुबिन गर्ग की 52 साल की उम्र में एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उनकी अंतिम यात्रा में गुवाहाटी में एक जन-सैलाब देखा गया। लिम्का बुक ऑफ रेकॉर्ड्स में इसे किसी अंतिम यात्रा में इतिहास का चौथा सबसे बड़ा जन-समागम बताया गया। असम के दिल की धड़कन पर तीन छोटी-छोटी कविताएं। 

***

सुबह सूरज कुछ अनमना-सा था,

कुछ थका-थका, कुछ बुझा-बुझा,

लगता है, उसने भी गुज़ारी थी 

कल की रात करवटें बदलकर। 

***

पंद्रह लाख ज़ुबिन उतरे 

उसकी विदाई में सड़कों पर,

पता ही नहीं चला 

कि कौन सा ज़ुबिन ज़िंदा था

और कौन सा नहीं था। 

***

फिर कभी आओ,

तो ज़ुबिन बनकर आना,

कहीं और नहीं, 

यहीं आसाम में आना। 

एक हम ही हैं,

जो समझेंगे तुम्हें,

एक हम ही हैं,

जिन्हें पता होगा 

तुम्हारा मूल्य। 


बुधवार, 27 अगस्त 2025

819.पासवर्ड

 


मेरी हर फ़ाइल का अलग पासवर्ड है,
हर पासवर्ड मुश्किल है,
बनाते वक़्त सोचा नहीं था
कि ज़रूरी होगा उन्हें याद रखना।
अब मेरी फ़ाइलें महफ़ूज़ हैं,
किसी का डर नहीं है उन्हें,
कोई और तो क्या,
मैं भी नहीं खोल सकता उन्हें।
धीरे-धीरे मैंने जाना है
कि छिपाना ज़रूरी हो सकता है,
पर सारी फ़ाइलें नहीं,
छिपाने की कोशिश में भी
संतुलन ज़रूरी है।
उन फ़ाइलों के पासवर्ड हटाइए,
जिन्हें छिपाना ज़रूरी नहीं है
और जिन्हें छिपाना ज़रूरी है,
उनके पासवर्ड भी ऐसे हों
कि कम-से-कम आप खोल सकें
उन फ़ाइलों को आसानी से।