वह इमारत आज फिर उदास है,
आज फिर कोई कूदा है उसकी छत से.
उस इमारत में कोई नहीं रहता,
वह बस कूदने के काम आती है,
इमारत का दिल बहुत धड़कता है,
जब कोई उसकी सीढ़ियाँ चढ़ता है.
इमारत चाहती है ज़मींदोज़ होना,
आसमान छूना पसंद नहीं उसे,
वह चाहती है, जहाँ वह खड़ी है,
कोई छोटी-सी झोपड़ी बने वहाँ ,
जिस पर से कोई कूद न सके,
कूद भी जाय, तो मर न सके.
