शनिवार, 4 अप्रैल 2020

४१८. जुगनू

न मेरे पास दिया है,
न तेल, न बाती,
दिवाली की बची 
कोई मोमबत्ती भी नहीं है,
न ही कोई फ़्लैश लाइट है 
मेरे पुराने मोबाइल में.

फिर भी मैं खड़ा हो जाऊंगा 
घर की देहरी पर,
फैला दूंगा हथेलियाँ,
आ बैठेगा उनमें 
कोई-न-कोई जुगनू 
जब बंद हो जाएंगे बल्ब,
जब नहीं जल रही होगी 
कहीं कोई ट्यूबलाइट.

14 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 05 एप्रिल 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  2. घर की देहरी पर,
    फैला दूंगा हथेलियाँ,
    आ बैठेगा उनमें
    कोई-न-कोई जुगनू
    जब बंद हो जाएंगे बल्ब,
    जब नहीं जल रही होगी
    कहीं कोई ट्यूबलाइट.
    अद्भुत शब्द चित्र ..बहुत सुन्दर सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (06 -04-2020) को 'इन दिनों सपने नहीं आते'(चर्चा अंक-3663) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    रवीन्द्र सिंह यादव

    जवाब देंहटाएं
  4. निराशा से आशा की ओर देखती रचना. बहुत सुन्दर.

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर सृजन ओंकार जी ,ना तेल ,ना मोमबती ,पर मन में मानवता का दीपक जलाकर देशवासियों के साथ प्रार्थना तो कर ही सकते थे न। उम्मींदों से भरा सृजन ,सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह बहुत सुंदर भाव..विषम परिस्थितियों में सामर्थ्य अनुरूप व्यवहार की आशा ही मनुष्यता है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  7. वाह !बहुत ही सुंदर सृजन आदरणीय सर
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  8. भावपूर्ण और प्रभावी रचना
    वाह

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत ही उम्दा लिखावट , बहुत ही सुंदर और सटीक तरह से जानकारी दी है आपने ,उम्मीद है आगे भी इसी तरह से बेहतरीन article मिलते रहेंगे Best Whatsapp status 2020 (आप सभी के लिए बेहतरीन शायरी और Whatsapp स्टेटस संग्रह) Janvi Pathak

    जवाब देंहटाएं