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गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024

७५६.ओ मेरे आँगन के नीम

 



ओ मेरे आँगन के नीम,

इस तरह चुपके से ज़मीन पर 

टहनियाँ न गिराया करो,

मुझे लगता है, 

मेरी दहलीज़ पर कोई आया है. 


मेरे दिल की धड़कनें रूककर 

क़दमों की आहट सुनना चाहती हैं,

मेरे कान उस दस्तक का इंतज़ार करते हैं,

जो कभी किसी ने मेरे दरवाज़े पर नहीं दी. 


ओ मेरे आँगन के नीम,

मैं ही क्यों, तुम भी तो अकेले हो,

फ़र्क़ बस इतना है

कि तुम घर के बाहर हो. 


मेरे अकेलेपन, मेरी वेदना को 

तुम नहीं समझोगे, तो कौन समझेगा?

मेरे दोस्त, मेरे हमसफ़र,

इस तरह मेरे अकेलेपन का 

मज़ाक न उड़ाया करो,

मेरे आँगन में चुपके से 

टहनियाँ न गिराया करो.



गुरुवार, 1 फ़रवरी 2024

७५५. काश, कोई मुसीबत टूटे

 


आज फिर यादें टूट के बरसीं,

आज फिर ग़म के अंकुर फूटे. 


कहाँ तक रखते दोस्तों का हिसाब,

बहुत से मिले और बहुत से छूटे. 


यारों, उसे भी कोई सज़ा मुक़र्रर हो,

जो अपना चैन अपने हाथों लूटे.


हमीं में शायद कोई कमी थी वरना,

सारा ज़माना किसी से किसलिए रूठे?


पाँवों तले जिनके हथेली बिछाई,

उन्होंने दिखाए हमें दूर से अँगूठे.


छूट सी गई है अब चैन की आदत,

काश, आज फिर कोई मुसीबत टूटे. 


शनिवार, 27 जनवरी 2024

७५४. हवा से विनती

 


हवा के झोंके, चले आओ,

उड़ा लाओ बादल बरसनेवाले,

यहाँ सब बैठे हैं इंतज़ार में. 


सूख गई हैं सारी नदियाँ,

पत्थर-से हो गए हैं उनके तल,

सूखे पत्ते छाती से चिपकाए 

निढाल से खड़े हैं पेड़. 


मारे प्यास के अधमरी,

पस्त सी पड़ी है ज़मीन,

जी-भर भीगने की आस में 

बड़े हो रहे हैं नन्हे-मुन्ने।


भर भी दो नदियाँ -बावड़ियाँ,

सींच भी दो प्यासे पेड़ों को,

पिला भी दो जी-भर के पानी, 

मिटा दो ज़मीन की प्यास,

महसूस करने दो मासूमों को 

नन्ही-नन्ही बारिश की बूँदें

अपनी मुलायम हथेलियों पर. 


अब तो रहम खाओ,

बादलों को साथ लेकर 

हवा के झोंके, चले आओ. 



रविवार, 21 जनवरी 2024

७५३.नए साल का कैलेंडर

 


मत चिपकाओ मेरे कमरे की दीवार पर 

नए साल का कैलेंडर. 


इसमें वही तारीख़ें हैं,

वही सप्ताह, वही दिन हैं,

यहाँ तक कि काग़ज़ भी वही,

स्याही भी वही है. 


ये चेहरे, जिन्हें तुम नया बताते हो,

पुराने कैलेंडरों में भी थे,

बस इनकी मूँछें बढ़ गई हैं 

या इनका हेयर-स्टाइल बदल गया है,

इनकी आँखों में वही अजनबीपन है,

इनके होंठों पर वही बनावटी मुस्कान है. 


किसी नए साल की तरह पुराना है 

तुम्हारा यह नया कैलेंडर,

इसे मेरे कमरे की दीवार पर मत चिपकाओ.



शनिवार, 13 जनवरी 2024

७५२.धूल

 


मैं उतना बदसूरत नहीं, 

जितना दिखता हूँ,

मेरा चेहरा वैसा नहीं,

जैसा दिखता है. 


मेरे चेहरे पर धूल है,

जो किसी ने उड़ाई थी,

अब ऐसे चिपक गई है 

कि उतरती ही नहीं. 


उड़ानेवाला नहीं जानता 

कि किस-किस पर गिरेगी,

कहाँ-कहाँ गिरेगी,

किन चेहरों को ढकेगी

उसकी उड़ाई धूल. 


वह तो यह भी नहीं जानता 

कि धूल उड़ेगी,तो चिपकेगी 

उसके अपने चेहरे से भी.