ओ मेरे आँगन के नीम,
इस तरह चुपके से ज़मीन पर
टहनियाँ न गिराया करो,
मुझे लगता है,
मेरी दहलीज़ पर कोई आया है.
मेरे दिल की धड़कनें रूककर
क़दमों की आहट सुनना चाहती हैं,
मेरे कान उस दस्तक का इंतज़ार करते हैं,
जो कभी किसी ने मेरे दरवाज़े पर नहीं दी.
ओ मेरे आँगन के नीम,
मैं ही क्यों, तुम भी तो अकेले हो,
फ़र्क़ बस इतना है
कि तुम घर के बाहर हो.
मेरे अकेलेपन, मेरी वेदना को
तुम नहीं समझोगे, तो कौन समझेगा?
मेरे दोस्त, मेरे हमसफ़र,
इस तरह मेरे अकेलेपन का
मज़ाक न उड़ाया करो,
मेरे आँगन में चुपके से
टहनियाँ न गिराया करो.
