बहुत विशाल होती है नदी,
बहुत गहरी,
पर कोई भी उतर जाता है उसमें,
नहीं पहचानती वह
अपनी ताक़त.
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नदी,
तुम ऊपर से शांत हो,
पर नीचे तेज़ है तुम्हारी धार,
कितना अच्छा होता,
जो इसका उल्टा हुआ होता.
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नदी,
तुम शांत हो, तो रहो,
पर कुछ ऐसा करो
कि जो तुम्हें देखे
समझ ही न पाए,
तुम्हें छेड़ा जा सकता है या नहीं.
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नदी,
तुम चुपचाप बहना चाहो, बहो,
पर कभी-कभी तुम में
उफान भी आना चाहिए,
बहुत ज़रूरी है ऐसा होना
तुम्हारी अस्मिता के लिए.

