मूर्ख बनाने का भी कोई दिन होता है क्या,
हम तो हमेशा ही बनाते रहते हैं,
शुरुआत में प्रयोजन से बनाते थे,
अब तो आदत हो गई है बनाने की।
कितना अच्छा लगता है मूर्ख बनाकर,
भरोसा हो जाता है अपनी होशियारी में,
पर यह कहाँ पता होता है हमें
कि मूर्ख बनाने के चक्कर में
कितने मूर्ख लगते हैं हम ख़ुद?
कौन नहीं जानता हमारे सिवा
कि कितने बड़े मूर्ख हैं हम,
सब जानते हैं, जितने हम लगते हैं,
असल में उससे ज़्यादा ही होंगे।
अब से फ़र्स्ट अप्रैल को मूर्ख बनाने की नहीं,
अपनी मूर्खता को पहचानने की कोशिश करें
और पहचान जाएँ, तो ग़म न करें,
मूर्खता की नहीं, होशियारी की बात है
कि होशियार होने से बेहतर है मूर्ख होना।
सुन्दर
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 03 अप्रैल 2025 को लिंक की जाएगी ....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
बहुत सटीक और सुंदर
जवाब देंहटाएंवाह! ! वैसे देखा जाये, अक्सर तो हम ख़ुद को ही मूर्ख बनाते हैं
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