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बुधवार, 5 जून 2024

७७०.मैं और मेरा मकान

 


मेरा मकान- 

बदरंग, 

जैसे बालों-भरे सिर पर 

गंजेपन का कोई टुकड़ा,

जैसे साफ़ कपड़े पर 

कोई तेल का धब्बा,

जैसे खुरचा हुआ कोई पुराना घाव. 


मेरा मकान-

अकेला,

जैसे घर के कोने में पड़ा 

पिछले साल का कैलेंडर,

जैसे जाड़े की रात में 

चौराहे पर खड़ा बूढ़ा,

जैसे अँधेरे में टिमटिमाती 

गाड़ी की पिछली बत्ती. 


मैं- 

बदरंग और अकेला,

जैसे मेरा मकान. 



4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 06 जून 2024 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  2. मकान बदरंग और अकेले हो जाते हैं जब कोई उनमें नहीं रहता, आदमी भी बदरंग और अकेले हो जाते हैं जब हर उम्मीद का दामन छूट जाता है, मार्मिक रचना !

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