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मंगलवार, 2 अप्रैल 2024

७६०.नरम-दिल पहाड़

 


पतली घुमावदार पगडंडियाँ 

कभी ऊपर, कभी नीचे,

कभी सामने, कभी ओझल,

जैसे कोई नटखट बच्ची 

पहाड़ों की ढलान पर 

मस्त दौड़ रही हो. 

 

देवदार के बेशर्म पेड़

घाटी से उचक-उचककर 

लगातार ताक रहे हैं

गाड़ी में बैठी लड़की को. 

 

साफ़ पानी की पतली धार 

थोड़े-थोड़े क़दमों के फ़ासले पर 

अपनी परिचित आवाज़ में 

व्यस्त-सा सलाम करती 

सर्र से निकल जाती है. 

 

न जाने कहाँ से आते हैं 

शीतल,पनीले बादल,

उंगलियों से चेहरों को सहलाकर,

हल्का-सा आलिंगन देकर 

पल-भर में चले जाते हैं. 

 

तुम अजनबी हो तो क्या,

यहाँ तुम्हारा स्वागत है, 

यह नरम-दिल पहाड़ है, 

कोई मैदानी शहर नहीं है. 

***


मेरी यह कविता हाल ही में हिंदी की वेब-पत्रिका राग दिल्ली( Social and Political News - Raag Delhi) में छपी है.

8 टिप्‍पणियां:

  1. शुभकामनाएं
    रचना सार्थक होती है तो
    हर जगह स्थान पाती है

    तुम अजनबी हो तो क्या,
    यहाँ तुम्हारा स्वागत है,
    यह नरम-दिल पहाड़ है,
    कोई मैदानी शहर नहीं है.
    सुंदर रचना
    सादर वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 04 अप्रैल 2024 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

    जवाब देंहटाएं
  3. तुम अजनबी हो तो क्या,
    यहाँ तुम्हारा स्वागत है,
    यह नरम-दिल पहाड़ है,
    कोई मैदानी शहर नहीं है,,,,, सुंदर रचना हमेशा की तरह आपकी रचनाओं को पढ़कर ये अहसास होता है जैसे खमोशी को लफ़्ज़ मिले हों उपहार में,बहुत ख़ूब आदरणीय ।

    जवाब देंहटाएं