शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

६६५.दीवारें

 


जब तक मेरे घर में 

कोई दीवार नहीं थी, 

घर बड़ा-सा लगता था,

अब दीवारें बन गई हैं,

तो लगता है,

एक ही घर में 

कई घर बन गए हैं. 

***

मुश्किल नहीं है

घर में दीवारें बनाना,

मुश्किल है,दीवारों को हटाना,

मुश्किल है, घर को फिर से घर बनाना. 

***

कैसा भी सीमेंट डालो,

कैसी भी ईंटें,

घर की दीवारें 

कमज़ोर करती हैं घर को.

***

मैं तोड़ना चाहता हूँ दीवारें,

मुझे बड़ा घर चाहिए,

बड़े घर में कई 

छोटे-छोटे घर नहीं. 

***

उसने पुकारा मुझे 

दीवार के उस पार से,

मैंने कुछ सुना ही नहीं।

छीन लेती हैं दीवारें 

देखने की ही नहीं,

सुनने की भी ताक़त. 


7 टिप्‍पणियां:

  1. वास्तव में घरों के बीच बनी दीवारें संवेदनशील हृदयों को दुख ही देती हैं । बहुत संवेदनशील सृजन ।

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  2. घर में बनी अनावश्यक दीवारें मन को आहत करती हैं ।

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  3. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (18-9-22} को विश्वकर्मा भगवान का वंदन" (चर्चा अंक 4555) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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    कामिनी सिन्हा

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  4. सार्थक लघु रचनाएं दीवारों की शानदार व्याख्या।

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  5. एक घर में अनेक घर बन जाना बेहद दुखद होता है

    मार्मिक लेखन

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  6. सत्य ,सार्थक,हृदय को स्पर्श करने वाली रचना आदरणीय,सादर

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  7. घर क़े बीच दीवारें घर को कई हिस्से में बाँट देती है. दीवारें घर में रहने वालों क़े बीच नहीं हों, ये जरुरी है. बहुत सार्थक संदेश देती रचना! --साधुवाद!--ब्रजेन्द्र नाथ

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