top hindi blogs

मंगलवार, 1 अप्रैल 2025

801. फ़र्स्ट अप्रैल

 


मूर्ख बनाने का भी कोई दिन होता है क्या,

हम तो हमेशा ही बनाते रहते हैं, 

शुरुआत में प्रयोजन से बनाते थे, 

अब तो आदत हो गई है बनाने की। 


कितना अच्छा लगता है मूर्ख बनाकर,

भरोसा हो जाता है अपनी होशियारी में, 

पर यह कहाँ पता होता है हमें 

कि मूर्ख बनाने के चक्कर में 

कितने मूर्ख लगते हैं हम ख़ुद?


कौन नहीं जानता हमारे सिवा 

कि कितने बड़े मूर्ख हैं हम, 

सब जानते हैं, जितने हम लगते हैं, 

असल में उससे ज़्यादा ही होंगे। 


अब से फ़र्स्ट अप्रैल को मूर्ख बनाने की नहीं, 

अपनी मूर्खता को पहचानने की कोशिश करें

और पहचान जाएँ, तो ग़म न करें, 

मूर्खता की नहीं, होशियारी की बात है

कि होशियार होने से बेहतर है मूर्ख होना।  


शुक्रवार, 28 मार्च 2025

800. ट्रेन में चढ़ने की कोशिश में औरत

 


वह हमेशा समय पर पहुंची स्टेशन,

पर चढ़ नहीं पाई किसी डिब्बे में,

उसे ठेल दिया हमेशा

चढ़नेवालों या उतरनेवालों ने,

प्लेटफ़ॉर्म पर ही छूटती रही वह।


देर से उसे समझ में आया है

कि ट्रेन में चढ़ने के लिए

काफ़ी नहीं है टिकट ले लेना,

समय से प्लेटफ़ॉर्म पर आ जाना,

डिब्बे तक पहुंच जाना।


उसे ज़्यादा ज़ोर लगाना होगा,

थोड़ा स्वार्थी, थोड़ा निर्मम होना होगा,

थोड़ी हिम्मत जुटानी होगी,

चीरना पड़ेगा भीड़ को,

तभी वह चढ़ पाएगी डिब्बे में,

तभी वह कर पाएगी यात्रा।


बुधवार, 19 मार्च 2025

799. बूढ़ी सड़क


वृद्धावस्था पर मेरी 51 हिन्दी कविताओं का संकलन ‘बूढ़ा पेड़’ अमेज़न पर उपलब्ध है। संकलन की एक कविता का मैंने अंग्रेज़ी में अनुवाद किया है। पढ़िए, मूल कविता और उसका अनुवाद।

***
तुम्हें याद है न,
इसी सड़क पर चलकर
तुम कभी हाईवे तक पहुंचे थे?
अब यह सड़क
जगह-जगह से टूट गई है,
किसी को कहीं नहीं पहुंचाती
अब यह सड़क।

एहसान चुकाने के लिए ही सही,
इसकी मरम्मत करा दो
या यही सोचकर करा दो
कि कल किसने देखा है,
कौन जाने,
इसी सड़क से तुम्हें
कभी वापस लौटना पड़े?

**


Old Road

Do you still remember,

You had taken this road

To reach the highway? 

Now, it is broken at places,

Unfit to take anyone anywhere,

But it’s still not beyond repair. 

 

Mend it to repay the debt

Or maybe for your own good,

Who knows, you may need it again

To come back some day?


मंगलवार, 11 मार्च 2025

798. होली की आहट

 


समय से पहले कूकने लगी है कोयल,

बहने लगी है पछुआ हवा, 

बौर आ गए हैं आम पर,

सबको इंतज़ार है 

इस होली में तुम्हारे गाँव आने का। 

++

तुम होली न खेलना चाहो, 

तो न सही, 

कम-से-कम आ तो जाओ,

रंगत आ जाएगी कई चेहरों पर 

तुम्हारे आने-भर से। 

++

पिछले फागुन में तुम नहीं आए, 

तो मैंने जाना 

कि होली हर साल आए,

कोई ज़रूरी नहीं है। 

रविवार, 2 मार्च 2025

797. चलो, एक कविता लिखते हैं

 




चलो, आज एक कविता लिखते हैं,

थोड़ा तुम लिखो, 

थोड़ा मैं लिखूँ,

अलग-अलग नहीं, 

साथ मिलकर एक 

अधूरा काम पूरा करते हैं। 


न तुम अपना कष्ट लिखो,

न मैं अपनी तकलीफ़ लिखूँ, 

आज ख़ुद को भूलकर 

 दूसरों का दर्द लिखते हैं। 


न इश्क़ पर कुछ लिखें,

न साक़ी पर, न मय-ख़ाने पर,

न नशीली आँखों पर,

न रसीले होंठों पर, 

आज मेहनतकशों की सुध लेते हैं। 


कोशिश करें, कुछ हटकर लिखें,

उस महिला के बारे में लिखें, 

जो अनदेखी की आग में

अरसे से सुलग रही है, 

उस बूढ़े के बारे में लिखें, 

जिसे मौत तक भूल चुकी है, 

उस बच्चे के बारे में लिखें,

जिसने कभी जाना ही नहीं बचपन। 


आज बे-ज़बानों की ज़बान बनते हैं, 

चलो, आज एक कविता लिखते हैं।