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रविवार, 7 जनवरी 2024

७५१. प्यार और पसंद



तुम्हारे हाव-भाव,

तौर-तरीक़े, चाल-ढाल 

मुझे बिल्कुल पसंद नहीं,

मैं आँखें बंद करके सोचूँ,

तो भी कुछ ऐसा नहीं दिखता,

जो मैं पसंद करूँ तुममें,

पर न जाने क्यों,

तुम्हारा दुःख मुझसे 

सहा नहीं जाता,

तुम्हारी ज़रा-सी तकलीफ़ 

मुझे बेचैन कर देती है,

न जाने क्यों मुझे हर वक़्त 

तुम्हारा ही ख़्याल रहता है. 

कभी-कभी मैं सोचता हूँ 

कि काश मैं तुम्हें प्यार नहीं करता,

जैसे कि मैं तुम्हें पसंद नहीं करता. 

 

बुधवार, 3 जनवरी 2024

७५०.आख़िरी समय

 


इतनी जल्दी भी क्या है?

एक मेल भेज दूँ,

एक ट्वीट कर लूँ,

एक पोस्ट लिख लूँ,

स्टेटस अपडेट कर लूँ,

तो चलूँ. 


यह सब कर लूँ,

फिर भी मोहलत मिल जाय,

तो कुछ ऐसा भी कर लूँ,

जो कभी कर नहीं पाया. 


थोड़ा और समय मिल जाय,

तो एक नेक काम कर लूँ,

बस फिर चलूँ. 



शनिवार, 30 दिसंबर 2023

७४९. नया-पुराना साल

 


नूतन वर्ष में 

सभी उल्लास में हैं,

ख़ुशियाँ मना रहे हैं,

इतना लगाव है नए से,

तो पुराने से क्यों चिपके हैं?

++

आओ, नए साल में कुछ नया करें,

कोई नया चोला पहनें,

नया जोश, नए विचार, नए इरादे नहीं,

तो फिर नया क्या है,

सिर्फ़ दीवार पर लटका कैलेंडर?

++

जो पुराना है,

सब बुरा नहीं है,

जो नया है,

सब अच्छा नहीं है, 

नए को अपनाओ,

तो कुछ पुराना भी रखो,

जैसे नया साल साथ रखता है 

पुराने महीने।

++

नए साल में नया क्या है?

वही पुराने महीने,

वही पुराने दिन,

बस तारीखों को मिल जाते हैं 

बदले हुए वार

और चार साल में 

फ़रवरी के हिस्से आ जाती है  

एक दिन की भीख। 

++

नया कुछ नहीं होता,

हो ही नहीं सकता,

मिट्टी वही है,

पानी वही है,

चाक वही है,

पर कुम्हार को लगता है,

उसने कुछ नया गढ़ा है। 

++

रात के बारह बजते ही 

पुराना साल जाएगा,

नया आएगा,

संगम के इस पल में भी 

दोनों मिलेंगे नहीं,

बस दूर से देखेंगे 

एक दूसरे की ओर। 

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2023

७४८. शहर में रात

 


नाड़े-सी लटकती सड़कें,

बदहवास दौड़ती गाड़ियाँ,

अकेले टिमटिमाते बल्ब. 


झगड़ते कुत्तों के मुहल्ले,

बिलखती बिल्लियों की गलियाँ,

उचटती नींद से चिपके बदन. 


ऊँघते-से ट्रैफिक सिग्नल,

अनमने-से चेक-पोस्ट,

कुर्सियों पर फैली वर्दियाँ।


पटरियों पर बिछे लोग,

सिरहाने रखी गठरियाँ,

गठरियों में बँधे घर. 


खुलने को है सूरज की रक्तिम आँखें,

आने को है यंत्रणा का एक और दिन. 


शुक्रवार, 15 दिसंबर 2023

७४७. वह लड़की


 

गाँव से निकलते ही वह पेड़ है,

जहाँ वह लटक गई थी 

या लटका दी गई थी,

उसके गले में वही चुन्नी थी,

जिसे ओढ़कर वह घूमा करती थी,

एक ही कमी थी उसमें 

कि वह सुन्दर बहुत थी. 


कोई नहीं जाता अब उस ओर,

कहते हैं, भूत नहीं दिखता उसका,

वह ख़ुद दिखती है लटकी हुई 

और दिखता है उसका दुपट्टा. 


मैं भी नहीं जाता कभी उस ओर,

पर मुझ तक आ जाता है वह पेड़,

वह डाली, वह लड़की, वह दुपट्टा 

मैं इन दिनों भूत-सा दिखता हूँ.