इन दिनों असम में रंगाली बिहू की धूम है। यह उत्सव महीने-भर चलता है। बिहू की परंपराओं और उसके मूड पर आधारित है यह ग़ज़ल।
**
मुर्दा दिलों में उमंग है बिहू में,
बेरंग चेहरों पर रंग है बिहू में।
ढोल जो बजा ,तो थिरकने लगे पाँव,
शराब में नहीं, जो नशा है बिहू में।
भटकते रहोगे जंगलों में कब तक,
लौट आओ बस्ती में इस साल बिहू में।
पेपा भी बजाता है, टोका भी, गगना भी,
हुनर उसका देखिए, तो देखिए बिहू में।
बांध लिया है उसने जो सिर पर गमछा,
मेरी ही नज़र न लग जाए उसे बिहू में।
झटके से दिल मेरा तोड़ दिया उसने,
पाँव छूए, गमछा दिया इस बार बिहू में।
झूम रहा है कपौ, फूला-फूला सा लगता है,
खोंसा जाएगा वह, किसी जूड़े में बिहू में।
काटने को दौड़ता है तुम्हारे बिना घर,
तुम्हारा ही घर है, चले आओ बिहू में।
पल-पल आज तुम नई सी लगती हो,
जादू है तुममें या जादू है बिहू में?

बिहू के रंगों को बिखेरती सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंWelcome to blog new post
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में मंगलवार 05 मई, 2026
जवाब देंहटाएंको लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
रंगोली बिहू की शुभकामनाएँ
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएं