बहुत पतंगें थीं आसमान में,
जिनमें से एक हठात कट गई,
बड़ी देर से उड़ रही थी,
हिचकोले खा रही थी,
फिर संभल भी रही थी।
लड़ना आता था उसे,
मज़बूत थी उसकी डोर,
तेज़ था उसका माँझा,
लग नहीं रहा था कि कटेगी,
हिम्मतवाली थी वह बूढ़ी पतंग।
कोई नहीं जानता
कि कब तक उड़ेगी कौन सी पतंग ,
पर इतना तो तय है
कि कितनी भी जीवटवाली हो पतंग,
कितना भी तेज़ हो उसका माँझा,
कितनी भी मज़बूत हो उसकी डोर,
कटना ही पड़ता है हर पतंग को,
फटना ही पड़ता है कभी-न-कभी।

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