कई लोग थे प्लेटफॉर्म पर,
एक को चढ़ना था,
बाक़ी सब चढ़ाने आए थे।
ट्रेन आई, तो वह चढ़ गया,
जो चढ़ाने आया था,
जिसका कोई इरादा नहीं था
यात्रा पर निकलने का,
जिसका सामान घर पर रखा था।
जिसे चढ़ना था,
उसका सामान बंधा ही रह गया,
वह प्लेटफॉर्म पर बैठा
इंतज़ार कर रहा है अगली ट्रेन का
जो न जाने कब आएगी,
न जाने किसे ले जाएगी।

ज़िंदगी एक ट्रेन का सफ़र... दार्शनिक भाव।
जवाब देंहटाएंसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ९ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सुंदर
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