शनिवार, 11 जून 2022

६५३.माँ




माँ थाली में आटा लेती है,

मिलाती है उसमें थोड़ा-सा नमक,

थोड़ी-सी अजवाइन, थोड़ा-सा घी

और गूँध देती है सब कुछ एक साथ.


माँ थोड़े-से आलू लेती है, 

टुकड़े करती है उनके 

और छौंक देती है 

प्याज,मिर्च,मसालों के साथ. 


माँ भर देती है डिब्बे में 

पूरियाँ,भाजी और थोड़ा-सा अचार,

रख देती है थैले में पानी के साथ 

और पकड़ा देती है मुझे जाते-जाते. 


भरपेट नाश्ता करके 

मैं निकलता हूँ सफ़र पर,

मगर गाड़ी में बैठते ही 

नज़र जाने लगती है थैले पर.


मैं अक्सर महसूस करता हूँ 

कि जब भी माँ खाना बांधती है,

मुझे भूख बहुत लगती है. 


 


16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब ... माँ के हाथ के खाने की बात ही अलग है ....

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  2. माँ का प्यार भूख भी खूब लगाता है । भवपूर्ण रचना ।

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  3. अक्सर महसूस करता हूँ

    कि जब भी माँ खाना बांधती है,

    मुझे भूख बहुत लगती है. ..बहुत सुंदर अनमोल भाव मां के लिए।

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  4. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार(१३-०६-२०२२ ) को
    'एक लेखक की व्यथा ' (चर्चा अंक-४४६०)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  5. मां के हाथ का खाना तो कभी भूला नहीं जा सकता ,सुंदर रचना

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  6. वाह सत्य एवं सारगर्भित भाव |

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  7. माँ के हाथों की सोंधी खुशबू से लबालब सुंदर रचना सर।
    सादर

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  8. आपकी लिखी रचना सोमवार 13 जून 2022 को
    पांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    संगीता स्वरूप

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  9. माँ के हाथ कहो या अंतस का प्यार।
    सच तो यही है।
    सुंदर हृदय तक उतरता सृजन।

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  10. माँ के हाथों से बने पकवान का उसके बच्चे के पेट से सीधा कनेक्शन होता है.

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  11. वाह…माँ के खाने की याद आ गई !

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  12. बहुत सुन्दर भावपूर्ण...
    माँ के हाथ के खाने की भूख या माँ के प्यार की भूख।

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  13. माँ के हाथ के खाने की याद आ गई😊

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  14. माँ के हाथ से बना खाना याद आ गया । बहुत सुन्दर सृजन ।

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  15. बहुत सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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