कभी गर्मी, कभी बारिश, कभी उमस,
मौसम, अपनी झोली में गहरे हाथ डालो,
कुछ अच्छा-सा हो, तो निकालो.
बहुत खेल ली आँख-मिचौली तुमने,
बहुत कर चुके मनमानी,
अब तो ज़रा रहम खा लो.
वे पुराने सुहाने दिन -
महीनों तक चलनेवाले,
न ज्यादा ठण्ड,न गर्मीवाले,
न बदबूदार पसीनेवाले,
न काँटों-से चुभनेवाले -
एक बार फिर से बुला लो.
दो झोलियाँ हों तुम्हारे पास,
तो फ़ेंक दो यह झोली,
दूसरी झटपट उठा लो.
मौन क्यों हो तुम, मौसम,
कब तक करते रहोगे तंग,
सब कुछ तो दिखा दिया तुमने,
सब को नचा दिया तुमने,
कोई कसर नहीं छोड़ी तुमने,
अब तो पलटी खा लो.
मौसम, अपनी झोली में गहरे हाथ डालो,
कुछ अच्छा-सा हो, तो निकालो.
बहुत खेल ली आँख-मिचौली तुमने,
बहुत कर चुके मनमानी,
अब तो ज़रा रहम खा लो.
वे पुराने सुहाने दिन -
महीनों तक चलनेवाले,
न ज्यादा ठण्ड,न गर्मीवाले,
न बदबूदार पसीनेवाले,
न काँटों-से चुभनेवाले -
एक बार फिर से बुला लो.
दो झोलियाँ हों तुम्हारे पास,
तो फ़ेंक दो यह झोली,
दूसरी झटपट उठा लो.
मौन क्यों हो तुम, मौसम,
कब तक करते रहोगे तंग,
सब कुछ तो दिखा दिया तुमने,
सब को नचा दिया तुमने,
कोई कसर नहीं छोड़ी तुमने,
अब तो पलटी खा लो.
