२५. इस बार की होली
बहुत देर खड़ा रहा मैं
तुम्हारी खिड़की के नीचे,
पर न तुमने खिड़की खोली,
न गुब्बारा फेंका.
बड़ा इंतज़ार था होली का,
पर तुम्हारी बेरुखी ने
पानी फेर दिया उम्मीदों पर
और मुझे पता भी नहीं
कि बेरुखी कि वज़ह क्या थी.
बड़ी फीकी रही इस साल की होली,
बहुत डला अबीर-गुलाल,
पर मैं रँगा ही नहीं,
बहुत पड़े गुब्बारे,
पर मैं भीगा ही नहीं.
बहुत देर खड़ा रहा मैं
तुम्हारी खिड़की के नीचे,
पर न तुमने खिड़की खोली,
न गुब्बारा फेंका.
बड़ा इंतज़ार था होली का,
पर तुम्हारी बेरुखी ने
पानी फेर दिया उम्मीदों पर
और मुझे पता भी नहीं
कि बेरुखी कि वज़ह क्या थी.
बड़ी फीकी रही इस साल की होली,
बहुत डला अबीर-गुलाल,
पर मैं रँगा ही नहीं,
बहुत पड़े गुब्बारे,
पर मैं भीगा ही नहीं.
