शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

३५३. पिता का जाना

मैंने देखा,
पिता को जाते,
अचानक,बिना-वजह.

उनके चेहरे पर थी 
रुकने की ख़्वाहिश,
उनकी आँखों में बेबसी,
उनके होंठों पर थे 
कुछ अस्पष्ट-से शब्द,
उनके हाथों में कोई 
अजनबी-सा इशारा.

क्या था उनके दिल में,
न वे समझा पाए,
न मैं समझ पाया.

मैं बदहवास-सा दौड़ा,
रोकने की कोशिश की,
हाथ पकड़े उनके,
पर उनको नहीं पकड़ पाया.

12 टिप्‍पणियां:

  1. बस यही आदमी के हाथ में नहीं होता ।

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  2. जी नमस्ते,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (7 -04-2019) को " माता के नवरात्र " (चर्चा अंक-3298) पर भी होगी।

    --

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

    आप भी सादर आमंत्रित है

    अनीता सैनी

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  3. ब्लॉग बुलेटिन टीम और मेरी ओर से आप सब को नव संवत्सर, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा व चैत्र नवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाएँ |

    ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 06/04/2019 की बुलेटिन, " नव संवत्सर, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा व चैत्र नवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाएँ “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. भावुक कर गई आपकी यह रचना। पिता का अवसान व विछोह का दुख मुझसे बेहतर और कौन समझ सकता है।

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  5. रोकने की कोशिश की,
    हाथ पकड़े उनके,
    पर उनको नहीं पकड़ पाया....., पीड़ा की अनुभूति के साथ मानव मन की कुछ न कर पाने की व्यथा प्रकट करती मर्मस्पर्शी रचना ।

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  6. अत्यंत मर्मस्पर्शी रचना ! यहीं पर सारी सामर्थ्य, सारी क्षमता, सारी धन दौलत, सारी प्रतिष्ठा रुतबा सब शून्य हो जाता है और हम संसार के सबसे निरीह प्राणी से नज़र आते हैं !

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  7. ह्रदय को स्पर्श करती
    बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति आपकी...

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. एक पल जो निकल जाता है हाथ से ... शायद कभी नहीं आता ...
    दिल से निकले शब्द ...

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  10. अनंत की यात्रा, एक पल में सब कुछ छूट जाता हुआ, परंतु अवश्यंभावी . . .
    उस पल को व्यक्त करते शब्द ...

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  11. मर्मस्पर्शी रचना , वो पल जब महसूस होता हैं हम नियति के आगे बेबस है, सादर नमस्कार आप को

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