ब्रह्मपुत्र,
बहुत दिनों बाद मिला हूँ तुमसे,
कुछ सूख से गए हो तुम,
कुछ उदास से लगते हो,
कौन सा ग़म है तुम्हें,
किस बात से परेशान हो?
अब पहले जैसे गरजते नहीं तुम,
चुपचाप बहे चले जाते हो,
तट पर बसे लोगों से उदासीन,
जैसे नाराज़ हो उनसे।
ब्रह्मपुत्र,
बहुत ग़लतियाँ हुई हैं हमसे,
पर हम तुम्हारी ही संतान हैं,
चाहो तो डुबा दो हमें,
पर पहले की तरह ठठाकर बहो,
हमसे यूँ मुंह न मोड़ो।