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शनिवार, 5 जनवरी 2019

३४०. बूढ़ा पेड़

एक चिड़िया 
उड़ते हुए आई,
चहचहाने लगी 
पेड़ की डाल पर।

बूढ़ा पेड़ हर्षाया,
बहुत दिनों बाद 
दूर हुआ उसका
एकाकीपन।

बस थोड़ी देर और,
फिर उड़ जाएगी चिड़िया,
उसका घोंसला कहीं और है,
पर पेड़ ख़ुश है,
थोड़े समय के लिए ही सही,
चिड़िया उसके पास आई तो.

बूढ़े पेड़ पर पत्ते न सही, 
उसकी उम्मीदें हरी हैं,
शायद फिर एकाध बार 
आ जाय कोई चिड़िया,
बैठ जाय उसकी डाली पर,
शायद एकाध बार फिर 
सुनाई पड़ जाय उसे 
चिड़ियों की चहचहाट
मरने से पहले।

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

३३९. सवाल


देख लो आज मुझे चोटी पर,
तारीफ़ कर लो मेरी,
मुस्कराहट है मेरे होठों पर,
लेकिन एक कसक है दिल में -
मरना पड़ा है मुझे बार-बार,
तब पहुँच पाया हूँ इस बुलंदी पर.

आज शिखर पर हूँ मैं,
पर दिल में सवाल है 
कि मर-मर कर ऊपर पहुंचने से 
जीते हुए नीचे रहना 
क्या ज़्यादा अच्छा नहीं है?

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

३३८.भँवर


मैंने खुला छोड़ रखा है 
अपने घर का दरवाज़ा,
इस उम्मीद में 
कि शायद भूला-भटका 
कोई दोस्त आ जाय 
या कोई अति उत्साही 
दुश्मन ही घुस आय.

दोस्त या दुश्मन न सही,
कोई चोर ही सही,
मेरे नीरस एकाकी जीवन में 
कुछ तो चहल-पहल हो,
इस ठहरे सरोवर में 
कोई लहर न सही,
कोई भँवर ही उठे. 

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

३३७. हँसो

बंद खिड़की की झिर्री से 
झाँक रही है तुम्हारी 
सहमी-सहमी सी हँसी। 

तुम्हारी हँसी, हँसी कम 
रुलाई ज़्यादा लगती है,
इससे तो बेहतर था,
तुम थोड़ा रो ही लेती। 

हँसना ही है,
तो खोल दो खिड़की,
खोल दो किवाड़,
तोड़ दो ताले,
लाँघ लो देहरी,
फिर पूरे मन से 
बिना डर, बिना झिझक,
दिन-दहाड़े,
खुल कर हँसो। 

हँसना ही है, तो ऐसे हँसो 
कि वे भी निकल आएं दबड़ों से,
जो लंबे अरसे से 
हँसना भूल गए हैं। 



शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

३३६.पौधे


अनुशासित से पौधे 
कितने ख़ुश लग रहे हैं 
और कितने सुन्दर !
बहुत मेहनत की है 
माली ने इन पर,
कतरी हैं इनकी 
पत्तियां-टहनियां,
तब जाकर मिला है इन्हें 
इतना सुन्दर रूप.

कोई पौधों से पूछे 
कि क्या सचमुच ख़ुश हैं वे,
कैसा लगता है 
जब बाँध दिया जाता है उन्हें 
एक सीमित दायरे में,
जहाँ से उन्हें 
पत्ता-भर झाँकने की भी 
अनुमति नहीं है.