मैं गाँव का स्टेशन,
अकेला, अनदेखी का मारा,
पटरियां गुज़रती हैं मेरे सामने से,
गाड़ियाँ सरपट दौड़ जाती हैं,
मैं बस देखता रह जाता हूँ.
दिनभर में एकाध पैसेंजर
हालचाल पूछ लेती है रूककर,
फिर निकल जाती है आगे,
मेरा प्लेटफ़ॉर्म सूना रह जाता है.
ओ राजधानी, रोज़ नहीं,
तो कभी-कभी ही रुक जाया करो,
दुआ-सलाम कर लिया करो,
यात्री चढ़ाने-उतारने के लिए नहीं,
तो क्रॉसिंग के लिए ही सही,
तकनीकी ख़राबी के बहाने ही सही,
पांच साल में एक बार ही सही,
जैसे चुनाव के दिनों में कभी-कभी
राजधानीवाले गाँव चले आते हैं.




