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शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

१४९. दुविधा



लहरें मचल-मचलकर आती हैं,
किनारे को भिगोकर 
फिर समंदर में लौट जाती हैं,
पर उनका मन नहीं भरता,
किनारे से मिलने की चाह 
उन्हें फिर से खींच लाती है. 

अनवरत चलता रहता है 
यह आने-जाने का सिलसिला,
बस लहरों की ऊर्जा 
कभी कम  हो जाती है,
तो कभी ज़्यादा.

मुझे समझ नहीं आता 
कि लहरें तय क्यों नहीं कर लेतीं 
कि उन्हें क्या करना है 
आना है या नहीं, 
बंद क्यों नहीं कर देतीं 
बार-बार आना 
और आकर लौट जाना. 

मैं आज तक नहीं समझ पाया  
कि आखिर प्यार में 
इतनी दुविधा क्यों होती है. 

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

१४८. छुपम-छुपाई

तुम्हें याद हैं न 
वे बचपन के दिन, 
जब हम साथ-साथ खेला करते थे,
अजीब-अजीब से,
तरह-तरह के खेल-
खासकर छुपम-छुपाई. 

मैं कहीं छिप जाता था 
और तुम आसानी से 
मुझे खोज निकालती थी.

मेरे छिपने की जगह 
कितनी भी मुश्किल क्यों न हो,
तुम्हें पता चल ही जाता था,
न जाने कैसे,
मुझे आज तक पता नहीं चला. 

न कपड़ों की सरसराहट,
न कोई बू, न खुश्बू ,
पर तुम हर बार मुझ तक  
पहुँच ही जाती थी.

सुनो, मुझे तब से तुम पर 
बहुत भरोसा है. 
अगर कभी ऐसा हो जाय 
कि मैं कहीं खो जाऊं 
और खुद को ढूंढ न सकूँ 
तो तुम आओगी न?

मैं जानता हूँ 
कि तुम मुझे ज़रूर खोज लोगी 
और कहोगी,'लो, हमेशा की तरह 
मैंने तुम्हें खोज लिया,
अब सम्भालो खुद को
और कभी ऐसी जगह न छिपना 
कि मुझे भागकर आना पड़े,
तुम्हें ढूंढना पड़े,
ताकि तुम फिर खुद से मिल सको'. 









शनिवार, 6 दिसंबर 2014

१४७. नाविक से


नाविक, बीच समंदर में 
किनारे से दूर,
अपनी नाव में एकाकी,
क्या तुम्हें डर नहीं लगता ?

जब लहरों के बीच 
तुम्हारी नाव डगमगाती है,
तुम गीत कैसे गा लेते हो ?
भीषण तूफ़ान की आशंका से 
तुम्हारी घिग्गी क्यों नहीं बँधती ?

नाविक, मैं किनारे पर खड़ा हूँ,
लहरों से बहुत दूर,
समंदर में कभी उतरे बिना ही 
डर से काँपता रहा हूँ,
पर अब सब बदलना चाहता हूँ,
तुम जैसा बनना चाहता हूँ. 

नाविक, इस बार वापस आओ,
तो मुझे भी साथ ले जाना
और छोड़ देना वहां,
जहाँ से किनारा दिखाई नहीं देता. 

रविवार, 30 नवंबर 2014

१४६. पुराने खत

इस  बार तो हद कर दी तुमने,
अपने पुराने खत वापस मांग लिए,
पर ऐसी कई चीज़ें हैं,
जो न तुम मांग सकती हो,
न मैं दे सकता हूँ. 

भीड़ में नज़रें बचाकर 
मेरी ओर उठतीं तुम्हारी निगाहें,
डरी-डरी सी तुम्हारी मुस्कराहटें,
मेरी ओर बढ़ते तुम्हारे ठहरे-से कदम
तुम्हारे कपड़ों की सरसराहट,
तुम्हारी उँगलियों की छुअन -
सब कुछ अब भी मेरे पास है,
तुम्हारे खतों से ज़्यादा महफ़ूज़. 

इसलिए कहता हूँ,
क्या करोगी खत वापस लेकर,
इन्हें मेरे पास ही रहने दो,
उन तमाम यादों की तरह,
जो मैं चाहूँ भी 
तो तुम्हें लौटा नहीं सकता.

शनिवार, 15 नवंबर 2014

१४५. कविता से

कविता, आजकल मैं उदास हूँ,
बहुत दिन बीत गए,
पर तुम आई ही नहीं.

तुम्हें याद हैं न वे दिन,
जब तुम कभी भी आ जाती थी -
मुंह-अँधेरे, दोपहर, शाम - कभी भी,
मुझे सोते से भी उठा देती थी,
जब सारे ज़रुरी काम छोड़कर 
मुझे तुम्हारा साथ देना पड़ता था,
वरना तुम रूठ जाती थी,
मुझे भी तो बहुत भाता था
सब कुछ भूल कर तुम्हारे साथ हो लेना.

देखो, आज फिर से  
मैं कलम-क़ागज़ लेकर तैयार हूँ,
भूल भी जाओ गिले-शिकवे,
पहले की तरह एक बार फिर 
मेरे पास दौड़ी चली आओ.

मेरी उदासी दूर करो, कविता, 
तुम्हें पुराने दिनों का वास्ता.