लहरें मचल-मचलकर आती हैं,
किनारे को भिगोकर
फिर समंदर में लौट जाती हैं,
पर उनका मन नहीं भरता,
किनारे से मिलने की चाह
उन्हें फिर से खींच लाती है.
अनवरत चलता रहता है
यह आने-जाने का सिलसिला,
बस लहरों की ऊर्जा
कभी कम हो जाती है,
तो कभी ज़्यादा.
मुझे समझ नहीं आता
कि लहरें तय क्यों नहीं कर लेतीं
कि उन्हें क्या करना है
आना है या नहीं,
बंद क्यों नहीं कर देतीं
बार-बार आना
और आकर लौट जाना.
मैं आज तक नहीं समझ पाया
कि आखिर प्यार में
इतनी दुविधा क्यों होती है.


