क्या तुम्हें पता है,
हमारे रिश्ते का पलस्तर
थोड़ा-थोड़ा झड़ने लगा है,
दीवार की इक्का-दुक्का ईंट
ज़रा-ज़रा हिलने लगी है,
फीकी पड़ने लगी है
रंगों की चमक,
एकाध टाइल कहीं-कहीं
चटखने लगी है,
फ़र्श कहीं-कहीं धंसने लगा है,
ज़मीन कहीं-कहीं झलकने लगी है.
चलो, अब चेत जांय,
ज़रा-सा डर जांय,
टूट-फूट का आकलन कर लें,
कहीं देर न हो जाय.
इतना तो मैं जानता हूँ,
तुम्हें भी तो पता है
कि रिश्ते और इमारत की मरम्मत
जितनी जल्दी हो जाय,
उतना अच्छा है.
हमारे रिश्ते का पलस्तर
थोड़ा-थोड़ा झड़ने लगा है,
दीवार की इक्का-दुक्का ईंट
ज़रा-ज़रा हिलने लगी है,
फीकी पड़ने लगी है
रंगों की चमक,
एकाध टाइल कहीं-कहीं
चटखने लगी है,
फ़र्श कहीं-कहीं धंसने लगा है,
ज़मीन कहीं-कहीं झलकने लगी है.
चलो, अब चेत जांय,
ज़रा-सा डर जांय,
टूट-फूट का आकलन कर लें,
कहीं देर न हो जाय.
इतना तो मैं जानता हूँ,
तुम्हें भी तो पता है
कि रिश्ते और इमारत की मरम्मत
जितनी जल्दी हो जाय,
उतना अच्छा है.

