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शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

६०. असंतुलन

आजकल मेरे सिर का बोझ 
मेरी गर्दन से सहन नहीं होता, 
सिर से अलग तो हो नहीं सकती,
बस दर्द से कराहती रहती है.

मेरे घुटनों से सहन नहीं होता 
आजकल मेरे बदन का बोझ,
साथ रहना तो मजबूरी है,
बस दर्द से परेशान रहते हैं.

मेरी ज़रूरतों का बोझ नहीं उठता 
आजकल मेरी मेहनत से,
मेरी ख्वाहिशों का बोझ 
मेरे ईमान से सहन नहीं होता.

इन दिनों मैं संतुलन में नहीं हूँ,
लड़ रहा हूँ अपने आप से,
आजकल मेरे ही दो हिस्से 
एक दूसरे के विरोध में हैं.

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

५९.मैं और तुम

कभी-कभी मुझे लगता है 
कि मैं तुम्हारी तरह चलूँ,
तुम्हारी तरह हँसू,
तुम्हारी तरह सोचूँ,
तुम्हारी तरह बोलूँ,
क्यों न मैं तुम बन जाऊँ,
तुम्हें भी लगता है 
कि क्यों न तुम मैं बन जाओ.

देखो न, इस कोशिश में,
न मैं तुम बन पा रहा हूँ 
और न तुम मैं,
बल्कि मैं मैं नहीं रहा 
तुम तुम नहीं रही.

अच्छा होगा कि 
मैं बस मैं बना रहूँ
और तुम बस तुम.

मैं तुम बनूँ 
और तुम मैं 
इससे तो अच्छा है 
कि मैं और तुम
हम बन जाएँ.

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

५८. गृहिणी और चपातियाँ

गृहिणी बना रही है चपातियाँ,
जो फूल उठती हैं हर कोने से,
बन जाती हैं नर्म,मुलायम,जायकेदार.

कभी-कभी जब कहीं खो जाती है गृहिणी,
तो फट जाती हैं फूलती हुई चपातियाँ,
चिपक जाते हैं उनके पेट पीठ से,
फिर कभी नहीं फूलतीं चपातियाँ.

गृहिणी सोचती है,क्यों नहीं फटती वह
इन चपातियों की तरह,
न जाने कितनी जगह है उसके अंदर 
कि वह  फूलती ही चली जाती है.

कभी-कभी गृहिणी को लगता है,
बस बहुत हुआ, अब और नहीं,
अब तो वह फट के ही मानेगी,
पर वह फट नहीं पाती,
थोड़ा और फूल के रह जाती है.

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

५७.डाकिया



अरे निगोड़े डाकिए,
आजकल तुम देर से क्यों आते हो?
क्या घोड़े बेचकर सोते रहते हो 
या अफीम खाकर पड़े रहते हो?

तुम्हारी साईकिल धीरे क्यों चलती है,
क्या टायरों में हवा कम हो गई है?
नुक्कड़ पर आते ही बीड़ी क्यों सुलगाते हो,
घर से फूंककर क्यों नहीं आते?

थैला भर चिट्ठियाँ लाते हो,
एक मुझे देने में जान क्यों निकलती है?
क्यों तुम्हें ख्याल नहीं आता 
कि सुबह से कोई तुम्हारे इंतज़ार में है?

कहीं-न-कहीं कुछ-न-कुछ तो गड़बड़ है,
मैं डाकबाबू से शिकायत करूंगी,
तुमसे अच्छा तो वो पुराना डाकिया था,
जो कभी-कभार उनका खत तो लाता था.


रविवार, 18 नवंबर 2012

५६. मेरे अलावा

आजकल जिससे भी मिलता हूँ,
उसमें कमी नज़र आती है मुझे,
किसी का चेहरा-मोहरा नहीं जंचता
तो किसी की चाल-ढाल,
किसी का चाल-चलन चुभता है,
तो किसी के बोलने का अंदाज़,
किसी के मुंह की दुर्गन्ध नहीं सुहाती,
तो किसी के पसीने की बदबू.

आजकल जल्दी उकता जाता हूँ मैं,
बना नहीं पाता किसी को भी अपना,
भागता फिरता हूँ हर किसी से,
बस खुद के साथ रहता हूँ मैं.

आजकल बहुत परेशान हूँ मैं,
यही सोचता रहता हूँ 
कि बाकी सब वैसे क्यों नहीं 
जैसा मैं हूँ,
मेरे अलावा ऐसा कोई क्यों नहीं 
जो मुझे अच्छा लगे.