इस बार दिवाली पर अंधेरों में चलें.
उन अंतड़ियों से मिलें,जो कुलबुलाती हैं रोटी को,
उन आँखों से मिलें, जो घबराती हैं रौशनी से,
उन कानों से मिलें, जो तरसते हैं संगीत को,
उन होठों से मिलें, जो थरथरा कर रह जाते हैं.
इस बार दिवाली पर झुकी गर्दनों से मिलें,
उन जुबानों से मिलें, जो उगल न पाईं ज़हर,
उन रोंगटों से मिलें, जो खड़े रहे हमेशा,
उन दांतों से मिलें,जो कटकटा नहीं पाए.
इस बार अनउगी मूंछों से मिलें,
उन बाजुओं से मिलें, जो वज़न से डरते हैं,
उन अंतड़ियों से मिलें,जो कुलबुलाती हैं रोटी को,
उन आँखों से मिलें, जो घबराती हैं रौशनी से,
उन कानों से मिलें, जो तरसते हैं संगीत को,
उन होठों से मिलें, जो थरथरा कर रह जाते हैं.
इस बार दिवाली पर झुकी गर्दनों से मिलें,
उन जुबानों से मिलें, जो उगल न पाईं ज़हर,
उन रोंगटों से मिलें, जो खड़े रहे हमेशा,
उन दांतों से मिलें,जो कटकटा नहीं पाए.
इस बार अनउगी मूंछों से मिलें,
उन बाजुओं से मिलें, जो वज़न से डरते हैं,
उन पाँओं से मिलें, जो पहुंचे नहीं मंजिल तक,
उन दिलों से मिलें, जो डर-डर कर धड़कते हैं.
उन उँगलियों से मिलें, जो उठीं खुद की तरफ,
उन घुटनों से मिलें, जो कराहते रहे दर्द से,
उन आंसुओं से मिलें, जो बह नहीं पाए,
उन मुस्कराहटों से मिलें, जो होठों तक नहीं पंहुचीं.
इस बार चलती-फिरती लाशों से मिलें,
जिंदगी ढो रहे कंकालों से मिलें,
उन चेहरों से मिलें,जिन्होंने ओढ़ी है मुस्कराहट,
उन निशानों से मिलें, जो चोट से बने हैं.
इस बार दिवाली पर अंधेरों में चलें,
साथ में ले चलें-
उम्मीद के दिए,
हिम्मत की बातियाँ,
इरादों का तेल
और प्यार की माचिस,
देखते हैं, अंधेरों में कितने दिए जलते हैं.
उन दिलों से मिलें, जो डर-डर कर धड़कते हैं.
उन उँगलियों से मिलें, जो उठीं खुद की तरफ,
उन घुटनों से मिलें, जो कराहते रहे दर्द से,
उन आंसुओं से मिलें, जो बह नहीं पाए,
उन मुस्कराहटों से मिलें, जो होठों तक नहीं पंहुचीं.
इस बार चलती-फिरती लाशों से मिलें,
जिंदगी ढो रहे कंकालों से मिलें,
उन चेहरों से मिलें,जिन्होंने ओढ़ी है मुस्कराहट,
उन निशानों से मिलें, जो चोट से बने हैं.
इस बार दिवाली पर अंधेरों में चलें,
साथ में ले चलें-
उम्मीद के दिए,
हिम्मत की बातियाँ,
इरादों का तेल
और प्यार की माचिस,
देखते हैं, अंधेरों में कितने दिए जलते हैं.
