एक ख़ूबसूरत-सा ख़्वाब देखा मैंने,
गुलाब के हाथों में गुलाब देखा मैंने।
कहते हैं आँखें उसकी झील सी हैं,
गुलाब में झील, झील में गुलाब देखा मैंने।
न कभी सुना था, न कभी सोचा था,
एक चलता-फिरता गुलाब देखा मैंने।
जहां न खिला था, न खिल सकता था,
उसी सहरा में गुलाब देखा मैंने।
गुलाब नावाक़िफ़ था गुलाब होने से,
उसने माना ही नहीं कि गुलाब देखा मैंने।
जानता हूँ, उसने कांटे देखे मुझमें,
उसे पता है, उसमें गुलाब देखा मैंने।
इस बात से वह नाराज़ है मुझसे,
उसमें काँटा नहीं, गुलाब देखा मैंने।
न नींद आती है, न चैन पड़ता है,
किस मनहूस घड़ी में गुलाब देखा मैंने?

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बहुत खूब!! वाक़ई नज़र नज़र का फेर है, कोई काँटे में फूल देखता है, कोई फूल में काँटा!!
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