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मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

828. वह कमरा

 


इन दिनों अजीब सा लगता है वह कमरा।

 

आवाज़ें आती हैं उससे, पर ग़ायब है

वह जानी-पहचानी बुलंद-सी आवाज़,

हँसता है कोई उसमें कभी-कभी,

पर उदास लगता है वह कमरा।

 

खिड़की-रोशनदान तो हैं उसमें,

पर धूप है कि ठिठक जाती है,

हवा है कि फंस के रह जाती है।

 

रोज़ सफ़ाई होती है उसकी,

पर धूल है कि हटती ही नहीं,

चमकती है वहाँ रखी हुई चीज़ें,

पर साफ़ नहीं लगतीं पहले-सी।

 

बिस्तर भी है वहाँ, अलमारी भी,

कुर्सी भी है, तिपाई भी,

पर खाली-खाली सा लगता है,

वह अकेला उदास कमरा।

 

कुछ हो गया है उसे अचानक,

बीमार-सा लगता है वह इन दिनों,

कभी जो अपनी ओर खींचता था,

अब काटने को दौड़ता है वह कमरा।

 

 

 


बुधवार, 10 दिसंबर 2025

827. वह थी

 


वह जब थी,

तो पता ही नहीं था 

कि वह थी। 


वह बताती भी थी,

तो कोई समझता नहीं था 

कि वह थी। 


अब जब वह नहीं है,

तो पता चला है 

कि वह थी,

पर उसे कभी पता नहीं चलेगा 

कि हमें पता चल गया है 

कि वह थी। 


मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

826. एक ग़ज़ल

 



क़लम नहीं रही अब भरोसे के लायक़,
बीच ग़ज़ल स्याही जम सी गई है।
मै भी नहीं पहले सा, वह भी नहीं पहले सी,
दूरियाँ मगर कुछ कम सी गई हैं।
मिली थी मुझसे, तो फुलझड़ी थी वो,
छोड़कर गई है, तो बम सी गई है।
नज़र जब से आने लगी मुझे मंज़िल,
रफ़्तार चलने की थम सी गई है।
दिक़्क़तें यहां कुछ कम नहीं फिर भी,
तबीयत यहीं पर रम सी गई है।