बहुत दूर से,
बहुत देर से,
बहुत तकलीफ़ सहकर
तुम आख़िर पहुँच ही गई
मेरे दरवाज़े तक.
मैंने भी लगभग
खुला छोड़ रखा था दरवाज़ा,
तुम दस्तक देती,
तो खुल जाता अपने आप,
पर दरवाज़े तक आकर
तुम वापस लौट गई,
मैंने भी आहट सुन ली थी
तुम्हारे आने की,
पर दस्तक के इंतज़ार में रहा.
हम जब एक लम्बा सफ़र
तय कर लेते हैं,
तो एक आख़िरी कदम बढ़ाना
इतना मुश्किल क्यों हो जाता है,
या फिर आख़िरी कदम
वही क्यों नहीं बढ़ा लेता,
जिसने कोई सफ़र किया ही न हो.
बहुत देर से,
बहुत तकलीफ़ सहकर
तुम आख़िर पहुँच ही गई
मेरे दरवाज़े तक.
मैंने भी लगभग
खुला छोड़ रखा था दरवाज़ा,
तुम दस्तक देती,
तो खुल जाता अपने आप,
पर दरवाज़े तक आकर
तुम वापस लौट गई,
मैंने भी आहट सुन ली थी
तुम्हारे आने की,
पर दस्तक के इंतज़ार में रहा.
हम जब एक लम्बा सफ़र
तय कर लेते हैं,
तो एक आख़िरी कदम बढ़ाना
इतना मुश्किल क्यों हो जाता है,
या फिर आख़िरी कदम
वही क्यों नहीं बढ़ा लेता,
जिसने कोई सफ़र किया ही न हो.


