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शनिवार, 17 सितंबर 2016

२२८. नमक

बहुत काम की चीज़ हूँ मैं,
थोड़ा सा खर्च होता हूँ,
पर स्वाद बढ़ा देता हूँ,
भारी हूँ सब मसालों पर.

घुल-मिल जाता हूँ आसानी से,
बिना किसी नाज़-नखरे के,
फिर भी ख़ास क़ीमत नहीं मेरी,
अपमान अनदेखी से दुखी हूँ मैं.

बहुत देर लगी मुझे समझने में 
कि जो आसानी से मिल जाता है,
वह कितना भी अच्छा क्यों न हो,
उसकी कद्र नहीं होती.

शनिवार, 10 सितंबर 2016

२२७. सेकेण्ड की सूई


मैं सेकेण्ड की सूई की तरह 
तेज़-तेज़ घूमता रहता हूँ,
पर हर बार ख़ुद को वहीँ पाता हूँ,
जहाँ मंथर गति से घूमनेवाली 
मिनट और घंटे की सूइयां होती हैं.

मैंने सोचा कि क्या मेहनत बेकार है,
क्यों मैं बार-बार वहीँ पहुँच जाता हूँ,
जहाँ मिनट और घंटे की सूइयां होती हैं,
क्यों मुझे नहीं मिलती कोई नई मंजिल.

जीवनभर घूमने के बाद मैं समझा 
कि मेहनत ही सब कुछ नहीं होती,
ज़रूरी है परिधि से बाहर निकलना,
ज़रूरी है उस खूंटे को तोडना 
जिससे बंधकर हम तेज़-तेज़ घूमते हैं.

शनिवार, 3 सितंबर 2016

२२६. आसमान में अक्स

चाँद, कितने भोले हो तुम,
झील में घुसकर सोच रहे हो 
कि छिप जाओगे.

छिपे भी तो कहाँ ? पानी में ?
छिपने की सही जगह तो तलाशते,
अपनी आभा ही कम कर लेते,
आभा कम हो, तो छिपना आसान होता है.

यहाँ तो तुम साफ़ दिख रहे हो,
लगता है, तुमने पानी ओढ़ लिया है
ताकि तुम और निखर जाओ,
ताकि तुम साफ़-साफ़ नज़र आओ.

चाँद, कितने भोले हो तुम,
झील में छिपे बैठे हो,
इतना भी नहीं जानते 
कि तुम्हारा तो अक्स भी 
आसमान में साफ़ नज़र आता है.

शनिवार, 27 अगस्त 2016

२२५. रात की आवाज़

गहरी काली रात,
न चाँद, न सितारे,
न कोई किरण रौशनी की.

चारों ओर पसरा है 
डरावना सन्नाटा,
सिर्फ़ सांय-सांय 
हवा बह रही है.

दुबके हैं लोग घरों में,
कुछ नींद में हैं,
तो कुछ होने का 
नाटक कर रहे हैं.

लम्बी गहरी रात 
अब ऊब रही है,
जाने को बेचैन है,
पर ख़ुद नहीं जायेगी.

ज़रा ध्यान से सुनो,
जिस रात से तुम सहमे हुए हो,
वह तुमसे कह रही है
कि सोनेवालों, उठो,
मुझे भगाने की पहल करो,
सूरज तुम्हारे दरवाज़े पर
दस्तक दे रहा है. 

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

२२४. बदले हालात

उन्हें पसंद नहीं 
तुम्हारा आँखें दिखाना.
वे कुछ भी कहें,
तुम सिर झुकाए सुनती रहो,
बीच-बीच में नाड़ हिलाकर 
हामी भर दो, 
तो और भी अच्छा.

बदले हालात को पहचानो,
अब छूट चुका है तुम्हारा मायका,
हो चुकी हो तुम किसी और की,
खो चुकी हो अपनी पहचान,
अब सिर्फ़ कठपुतली हो तुम.

जिस दुनिया में तुम हो,
वह एक अलग दुनिया है,
वहां शादीशुदा महिलाओं का  
आँखें दिखाना सख्त मना है.