मैं जब भीड़ में होता हूँ,
तो मैं नहीं रहता,
बिल्कुल बदल जाता हूँ.
अकेले में मैं शांत हूँ,
पर भीड़ में हिंसक हो जाता हूँ,
गन्दी गालियां बक सकता हूँ,
हाथापाई कर सकता हूँ,
पत्थर फेंक सकता हूँ,
यहाँ तक कि किसी की
जान भी ले सकता हूँ.
अकेले में मुझे परवाह नहीं
नैतिकता और सिद्धांतों की,
पर भीड़ में बुराइयों के ख़िलाफ़
जमकर आवाज़ उठाता हूँ,
अकेले में नहीं सोचता मैं
न्याय-अन्याय के बारे में,
पर भीड़ में खूब चिल्लाता हूँ
उस अन्याय के ख़िलाफ़ भी
जो मैं हर रोज़ करता हूँ.
मैं अकेले में कुछ होता हूँ,
भीड़ में कुछ और,
मैं जो भीड़ में होता हूँ,
उस पर कभी मुझे शर्म आती है,
तो कभी गर्व होता है.
तो मैं नहीं रहता,
बिल्कुल बदल जाता हूँ.
अकेले में मैं शांत हूँ,
पर भीड़ में हिंसक हो जाता हूँ,
गन्दी गालियां बक सकता हूँ,
हाथापाई कर सकता हूँ,
पत्थर फेंक सकता हूँ,
यहाँ तक कि किसी की
जान भी ले सकता हूँ.
अकेले में मुझे परवाह नहीं
नैतिकता और सिद्धांतों की,
पर भीड़ में बुराइयों के ख़िलाफ़
जमकर आवाज़ उठाता हूँ,
अकेले में नहीं सोचता मैं
न्याय-अन्याय के बारे में,
पर भीड़ में खूब चिल्लाता हूँ
उस अन्याय के ख़िलाफ़ भी
जो मैं हर रोज़ करता हूँ.
मैं अकेले में कुछ होता हूँ,
भीड़ में कुछ और,
मैं जो भीड़ में होता हूँ,
उस पर कभी मुझे शर्म आती है,
तो कभी गर्व होता है.
