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शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

१८६. भीड़ में मैं

मैं जब भीड़ में होता हूँ,
तो मैं नहीं रहता,
बिल्कुल बदल जाता हूँ.

अकेले में मैं शांत हूँ,
पर भीड़ में हिंसक हो जाता हूँ,
गन्दी गालियां बक सकता हूँ,
हाथापाई कर सकता हूँ,
पत्थर फेंक सकता हूँ,
यहाँ तक कि किसी की
जान भी ले सकता हूँ.

अकेले में मुझे परवाह नहीं
नैतिकता और सिद्धांतों की,
पर भीड़ में बुराइयों के ख़िलाफ़
जमकर आवाज़ उठाता हूँ,

अकेले में नहीं सोचता मैं 
न्याय-अन्याय के बारे में,
पर भीड़ में खूब चिल्लाता हूँ 
उस अन्याय के ख़िलाफ़ भी 
जो मैं हर रोज़ करता हूँ. 

मैं अकेले में कुछ होता हूँ,
भीड़ में कुछ और,
मैं जो भीड़ में होता हूँ,
उस पर कभी मुझे शर्म आती है,
तो कभी गर्व होता है.

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

१८५. गाँव

मुझे याद है 
पूस की कंपकंपाती सुबहों में 
मुंह अँधेरे उठ जाती थी दादी,
मुझे भी जगा देती थी
और  आँगन के कुँए से 
बाल्टी-भर पानी खींचकर 
उड़ेल देती थी मुझपर
मेरी तमाम ना-नुकर के बावजूद। 

तैयार होकर मैं 
घर की बगिया में जाता था,
जवाकुसुम के अधखिले फूल तोड़कर 
डलिया में सजा देता था. 

फिर हम गाँव की गलियों से 
मंदिर के लिए निकलते थे,
जहाँ मैं भी कर लेता था 
थोड़ी-बहुत पूजा,
चढ़ा देता था प्रतिमा पर 
जवाकुसुम का एक फूल.

अब नहीं रही दादी,
नहीं रहा कुंआ,
नहीं रही बगिया,
जवाकुसुम के अधखिले फूल 
और आधी-अधूरी अर्चना. 

अब नहीं रहीं 
वे पूस की सुबहें,
अब नहीं रहा 
वह मासूम-सा गाँव।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

१८४. प्रेम

लोगों को मेरी प्रेम कविताएँ पसंद नहीं,
पर मुझे हमेशा लगता है 
कि मैं प्रेम कविताओं का कवि हूँ. 

मुझे अपनी कविताएँ अच्छी लगती हैं,
जब वे प्रेम के बारे में होती हैं,
पर मैं यह नहीं समझ पाता 
कि जो चीज़ मुझमें है ही नहीं,
वह मेरी कविताओं में कैसे आ जाती है 
और वह भी इतने असरदार तरीक़े से. 

अगर कोई मुझे बता दे 
कि अपनी कविताओं का प्रेम 
मैं अपने स्वभाव में कैसे लाऊँ, 
तो मैं इस बात के लिए तैयार हूँ 
कि फिर कभी प्रेम कविताएँ नहीं लिखूँ. 

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

१८३. असहाय एकलव्य

अर्जुन, कुरुक्षेत्र में एक युद्ध 
तुमने लड़ लिया, जीत लिया,
गुरु द्रोण को भी मार दिया,
अब तुम्हें राज-पाट चलाना है,
जीत का फल भोगना है,
पर बहुत से धर्म-युद्ध 
अभी भी लड़े जाने हैं. 

अर्जुन, विश्व के सबसे बड़े धनुर्धर,
तुम्हारे पास लड़ने का समय नहीं 
और मैं लड़ नहीं सकता,
क्योंकि मैंने तो अपना अंगूठा 
तुम्हें सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए 
कब का गुरु-दक्षिणा में दे दिया था. 

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

१८२. अधबना मकान

हमारा प्यार 
जैसे अधबना मकान,
ईंट-ईंट जोड़ी,
दीवारें बनाईं,
सीमेंट,सरिया,
बजरी-रोड़ी,
न जाने क्या-क्या मिलाया,
तब जाकर बना 
यह अधबना मकान। 

फिर क्यों हार मान ली,
क्यों छोड़ दिया अधूरा, 
थोड़ी-सी कोशिश करते 
तो पूरा हो जाता,
घर बन जाता यह 
अधबना मकान. 

अगर अधूरा ही छोड़ना था,
तो शुरू हो क्यों किया ?
जिधर मंज़िल ही नहीं थी,
उधर चले ही क्यों ?
क्यों देखे हमने रंगीन सपने 
जब करना ही नहीं था हमें 
गृह-प्रवेश…