दो हज़ार साल पहले
वह कौन था जिसने
उठाई थी सलीब,
वही सलीब जिस पर
उसे खुद चढ़ना था ?
वह कौन था ,
जिसका निकला था जुलूस,
जिसका उड़ा था मज़ाक,
जिसे मिला था दंड -
सच्चाई और अच्छाई का ?
तब से लगातार
वही सलीब, वही ईसा,
दोहराई जा रही है
वही पुरानी कहानी.
कितने हज़ार साल और लगेंगे
हालात बदलने में,
वह दिन कब आएगा,
जब सूली पर वही चढ़ेगा
जिसे उस पर चढ़ना चाहिए?
वह दिन कब आएगा
जब हम इतना कह सकेंगे
कि जो आदमी सूली पर चढ़ा है,
वह कम-से-कम ईसा नहीं है?
वह कौन था जिसने
उठाई थी सलीब,
वही सलीब जिस पर
उसे खुद चढ़ना था ?
वह कौन था ,
जिसका निकला था जुलूस,
जिसका उड़ा था मज़ाक,
जिसे मिला था दंड -
सच्चाई और अच्छाई का ?
तब से लगातार
वही सलीब, वही ईसा,
दोहराई जा रही है
वही पुरानी कहानी.
कितने हज़ार साल और लगेंगे
हालात बदलने में,
वह दिन कब आएगा,
जब सूली पर वही चढ़ेगा
जिसे उस पर चढ़ना चाहिए?
वह दिन कब आएगा
जब हम इतना कह सकेंगे
कि जो आदमी सूली पर चढ़ा है,
वह कम-से-कम ईसा नहीं है?
