दिन भर की थकान के बाद
जब गृहिणी बिस्तर पर पहुँचती है,
उसे नींद नहीं आती.
आज का अपमान,झिड़कियाँ,
कल की चिंताएं,परेशानियाँ,
उसे सोने नहीं देते.
सुबह उठकर गृहिणी देखती है
अपने हिस्से का बिस्तर
और उसपर पड़ी सिलवटें.
ये वे सिलवटें नहीं हैं,
जिन्हें देखकर शर्म आती है,
ये वे सिलवटें नहीं हैं,
जिन्हें देखकर लोग
मन-ही-मन मुस्कराते हैं,
ये बेचैनी की सिलवटें हैं.
हर सुबह गृहिणी
सिलवटें ठीक करती है,
हर सुबह गृहिणी
करवटें बदलने का दंड भोगती है,
गृहिणी की हर सुबह एक-सी होती है,
उसकी किसी सुबह में
कोई नया सूरज नहीं उगता.

