मेरी डोर उसके हाथों में है,
वह जब-जैसे चाहता है,
मुझे नचाता है.
कभी मुझे ढीला छोड़ देता है,
कभी अपनी और खींच लेता है,
कभी-कभी तो दूर से ही
मुझे चक्कर खिला देता है,
जैसे महसूस कराना चाहता हो
कि मैं उसके नियंत्रण में हूँ.
मैं बरसात,गर्मी,सर्दी,
तेज़ हवाएं - सब कुछ
अकेले बर्दाश्त करती हूँ,
वह कहीं आराम से बैठकर
चाय की चुस्कियों के बीच
मुझे उड़ाता रहता है.
कभी-कभी जब मैं उससे दूर
बादलों के बीच होती हूँ,
तो मुझे भ्रम हो जाता है
कि मैं मुक्त हो गई हूँ,
पर वह तुरंत डोर खींच लेता है
और कहीं कोने में पटक देता है
ताकि अगले दिन मुझे फिर उड़ा सके.




