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गुरुवार, 23 जुलाई 2026

862. जुगनू

 


जब डूब जाता है सूरज,

आकाश में नहीं होते चाँद-सितारे,

जब नहीं चमकती बिजली,

नहीं जलती कोई लालटेन,

चुक जाते हैं दीपक के तेल-बाती,

जब नहीं भड़कता कहीं कोई शोला, 

जब नहीं सूझता हाथ को हाथ,

घनघोर अंधेरा हँसता है ठठाकर,

तब मैं उठाता हूँ बीड़ा,

निकलता हूँ बाहर,

ललकारता हूँ अँधेरे को,

करता हूँ उद्घोष 

कि रौशनी अभी ज़िंदा है। 


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