शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

१५२. कोहरे में गाँव


कोहरे में अपना गाँव 
मुझे बहुत अच्छा लगता है. 

न टूटी सड़कें दिखती हैं,
न सूखे नल, 
न सूने पनघट,
न वीरान खेत, 
न खाली खलिहान।

बरगद के नीचे का 
वह चबूतरा भी नहीं दिखता,
जहाँ कभी जमघट लगता था,
हुक्के गुड़गुड़ाए जाते थे.

न नंगे बच्चे दिखते हैं,
न नशे में धुत्त युवक,
न सहमी-सहमी सी लड़कियाँ,
न वो पेड़ जहाँ पिछले दिनों 
दो प्रेमी लटकाए गए थे. 

नहीं दिखती मुझे 
माँ की झुकी कमर,
पिता के चेहरे की झुर्रियाँ,
उनकी आँखों की उदासी,
उनका अकेलापन. 

कोहरा छँटते ही मैं 
शहर के लिए निकल पड़ता हूँ,
कोहरे में अपना गाँव 
मुझे बहुत अच्छा लगता है. 

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर रचना , बहुत सुंदर

    छोटी सी अपील !
    हम लोग भी अच्छा काम कर रहे हैं,
    कृपया ब्लाग पर हमारा भी उत्साहवर्धन कीजिए
    http://maihoonnaws.blogspot.in/
    प्लीज

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  2. बहुत सुंदर. कोहरे से जिंदगी ठहर गई लगती है.
    नव वर्ष की शुभकामनाएं !

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  3. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (04-01-2015) को "एक और वर्ष बीत गया..." (चर्चा-1848) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    नव वर्ष-2015 की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. सुन्दर कवितायें बार-बार पढने पर मजबूर कर देती हैं. आपकी कवितायें उन्ही सुन्दर कविताओं में हैं.

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  5. पहले आप को नव वर्ष की ढेरों शुभकामनाएं ................प्यारी सी कविता और गजब की पंक्तियों का समावेश बहुत कुछ बयां कर देता है प्राकृतिक और मानव निर्मित मौसम को!

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  6. सच से सामना जो नहीं करना होता ... गहरी बातों की सहज लिखा है ...
    नव वर्ष मंगलमय हो ...

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