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शनिवार, 12 अप्रैल 2014

१२२. पेड़ पथिक से



तुम्हारे आने की खबर सुनकर 
लो, मैंने विदा कर दिया पतझड़,
समय से पहले बुला लिया वसंत,
कोमल हरे पत्ते ओढ़ लिए,
बिछा दी फूलों की चादर.

पथिक, तुम्हारे काम, तुम्हारे श्रम,
तुम्हारी सेवा-भावना को सलाम,
मंज़िल तक पहुँचने के तुम्हारे निश्चय,
तुम्हारे दृढ संकल्प को सलाम.

बहुत दूर से आ रहे हो तुम,
बहुत दूर जाना है तुम्हें,
थोड़ी देर को भूल जाओ सब कुछ,
थोड़ी देर सुस्ता लो मेरी छांव में,
पथिक, मुझ पर उपकार करो,
मेरा होना सार्थक करो.

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

१२१. लौ


इस लौ में सबकी चमक है.

किसी मुस्लिम कुम्हार ने 
इस मिट्टी को गूंधा है,
फिर चाक पर चढ़ाकर 
दिए का आकार दिया है.

किसी सिख ने इसमें 
आकंठ तेल भरा है,
किसी ईसाई ने मेहनत से 
इसकी बाती बनाई है,
फिर किसी हिंदू ने इसे
प्रज्जवलित किया है.

आसान नहीं होता 
अँधेरे को दूर भगाना,
जब सब मिलते हैं,
तब जाकर लौ जलती है.


शनिवार, 29 मार्च 2014

१२०.सीमा

मैं ध्रुवतारा नहीं हूँ,
पर मुझे कमज़ोर मत समझो,
मैं उतना छोटा नहीं हूँ,
जितना ज़मीन से दिखता हूँ.

तुम्हें बरगला रही हैं 
तुम्हारी अपनी सीमाएं,
ज़रा नज़दीक से देखो 
तो तुम्हें पता चले 
कि वास्तव में मैं क्या हूँ.

पर तुम कैसे नज़दीक आओगे,
कितना नज़दीक आओगे,
तुम्हारे नज़दीक आने की सीमा है.

दर्शक, तुम जहाँ हो, वहीँ रहो,
देखते रहो मेरा टिमटिमाना,
इसी सोच में खुश रहो
कि मैं कितना छोटा हूँ,
कितना प्रकाशहीन,
कितना बेबस!

शनिवार, 22 मार्च 2014

११९. मेंढक


मैंने सुना है कि
मेंढक लुप्त हो रहे हैं,
फिर चुनाव के दौरान 
इतने कहाँ से निकल आते हैं?
बिना बारिश के भी 
इनकी टर्र-टर्र क्यों सुनाई पड़ती है?

मुझे नहीं लगता 
कि मेंढक लुप्त हो रहे हैं,
ज़रूर कुछ भ्रम हुआ है,
मुझे तो लगता है 
कि इनकी बहुतायत हो गई है,
बस इनके निकलने और टरटराने का 
मौसम बदल गया है.

शनिवार, 1 मार्च 2014

११८. यह पल


ओस की बूँद ने आखिर 
खोज ही ली फूल की गोद,
अब चाहे तेज़ हवाएं आएं 
उसे गिराने,मिट्टी में मिलाने,
या सूरज की तेज़ किरण 
सोख ले उसे बेरहमी से,
या कोई अनजान हाथ
उसे अलग कर दे फूल से -
ओस की बूँद को परवाह नहीं.

बहुत खुश है वह
कि मंजिल पा ली है उसने,
अब सारे खतरों से बेखबर 
चुपचाप सोई है वह.

आनेवाले पल की चिंता में 
कैसे भूल जाए ओस की बूँद 
कि यह पल सबसे सुन्दर है,
यह पल, जब वह फूल की गोद में है.